बुधवार, 19 अक्तूबर 2016

ग्रामीण जीवनशैली, राजनीति का ताना-बाना

ऐसे समय में जबकि महानगरों की बेलौस जिंदगी, उन्मुक्त प्रेम-संबंध, सेक्स, देह केन्द्रित साहित्यिक कृतियों की रचना अधिकाधिक हो रही हो तब ग्रामीण अंचल को कथावस्तु का केंद्र बनाना जीवटता का कार्य कहा जायेगा. ऐसी जीवटता का काम लखनलाल पाल ने अपने उपन्यास बाड़ा के माध्यम से किया है. इसके साथ-साथ उन्होंने भाषा सम्बन्धी जोखिम भी उठाया है. गाँव की कथा कहते हुए वे बुन्देली भाषा, बोली के शब्दों का भरपूर प्रयोग करने से नहीं चूके हैं. कहानी के पात्रों का वार्तालाप उन्हीं की बोली, उन्हीं के अंदाज में होता है. वर्तमान दौर में जबकि हिन्दीभाषी लेखक भी हिन्दी के साथ-साथ हिंगलिश जैसी मिश्रित भाषा-बोली को जबरिया, खुलेआम ठूँसने में लगे हैं तब लखनलाल विशुद्ध ग्रामीण अंचल की कथा को विशुद्ध बुन्देली अंदाज में प्रस्तुत करने का कार्य करते हैं.

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में आज भी जाति, धर्म, राजनीति, आपसी मतभेद, गुपचुप साजिश करना आदि उपस्थित हैं. बाड़ा का ताना-बाना भी गाँव के इसी चरित्र के इर्द-गिर्द घूमता हुआ आगे बढ़ता है. उपन्यासकार ने बड़ी ही निष्पक्षता के साथ पात्रों को गढ़ते हुए ग्रामीण अंचल की आंतरिक व्यवस्था को सामने रखा है. विजातीय विवाह किये जाने के परिणामस्वरूप ग्रामीण व्यवस्था में कायम आंतरिक पारिवारिक, जातिगत व्यवस्था को तोड़ना या फिर उसके साथ सामंजस्य बनाते हुए संबंधों का, रिश्ते-नातों का निर्वहन करने की दुष्कर स्थिति को उपन्यास के पात्र जीते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी वैवाहिक समारोहों में, मांगलिक कार्यों में, संस्कारों आदि में जहाँ एक तरफ समन्वय, सहयोग की भावना अपने चरम पर दिखाई देती है वहीं दूसरी तरफ एकदूसरे को नीचा दिखाने की कुत्सित नीतियाँ भी बनती रहती हैं. रामकेश के चचेरे भाई द्वारा विजातीय विवाह करने के पश्चात् उठा विवाद, फिर जातिगत बहिष्कार के कारण जातिगत खेमेबंदी ने गाँव की मानसिकता को भली-भांति उकेरा है. इसी विवाद के बीच चाची का बाड़ा खरीदने को लेकर उठा मसला जातिगत वैमनष्यता को बढ़ाता है. अपने-अपने खेमों को बढ़ाने की नीति, अपने-अपने तरफ के लोगों को किसी न किसी रूप में अपने में ही शामिल बनाये रखने की जुगत के बीच दोनों पक्षों की हार-जीत होती रहती है.

रामकेश और भदोले दाऊ की जातिगत हनक स्थापित करने, अपना-अपना वर्चस्व बनाये रखने की जद्दोजहद करते हुए नए-नए हथकंडे अपनाते रहते हैं. हालाँकि बाड़ा खरीदने, उससे सम्बंधित लोगों के आपसी विवाद के बाद लम्बे समय तक बाड़ा गाँव की अन्य गतिविधियों के केंद्र से गायब ही रहता है तथापि अंत में वह पुनः कुल्हाड़ी लहराने के साथ सामने आ खड़ा होता है. ये लेखक का ग्रामीण अंचल से सम्बंधित होने का स्पष्ट परिचायक है कि आज भी गाँव के भीतर किसी विवाद का अंत नहीं होता है वरन देशकाल, परिस्थिति के अनुसार वह अपना रूप पुनः दिखा देता है.

उपन्यासकार लखनलाल कतिपय बिन्दुओं को लेकर जहाँ सशक्तता के साथ उभरकर सामने आते हैं वहीं किंचित कमजोर से भी दिखे हैं. एक महिला पात्र गुन्दी अत्यंत सशक्तता से अपनी उपस्थिति दर्शाती है. अपनी सौतेली बेटी को प्रताड़ित किये जाने की रोज-रोज की घटनाओं के बाद गुन्दी द्वारा उसी की ससुराल में जाकर उसकी सास को जबरदस्त तरीके से हड़काना, उसकी मजबूरी का फायदा उठाकर मिसुर द्वारा रुपये उधार देने के समय किये गए उसके शारीरिक शोषण का बौद्धिक रूप से बदला लेना, आवास योजना के अंतर्गत बनते मकानों की अनियमितता के विरोध में गुन्दी का खड़ा हो जाना, पति के अत्यंत बीमार होने के कारण गाँव भर के पुरुषों की कामलोलुप नज़रों का पूरे साहस के साथ सामना करना उसकी जिजीविषा को, उसके आत्मबल को दर्शाता है. लेखक संभवतः गाँव की कहानी कहने में, बाड़ा और जातिगत विवाद की कथा कहने में ज्यादा निमग्न रहे और इसी कारण से गुन्दी के चरित्र को और मजबूत बनाने से चूक गए. संभव है कि उपन्यास की मूलकथा को प्रभावित होने से बचाने के लिए ऐसा किया गया हो. बावजूद इसके लेखक द्वारा स्त्री सशक्तिकरण की एक नवीन परिभाषा का निर्माण किया जा सकता था.


ग्रामीण अंचल से परिचित पाठकों को इसे पढ़ने में अवश्य ही आनंद महसूस होगा क्योंकि बाड़ा की कथा कहीं न कहीं उन्हें अपने आसपास की कहानी प्रतीत होगी. इसी तरह ग्रामीण अंचल से अपरिचित पाठकों के लिए संभव है कि बाड़ा उपन्यास बोझिल अथवा नीरस लगे किन्तु यदि वे ग्रामीण अंचल को नजदीक से देखना-महसूस करना चाहते हैं तो उनके लिए इसे पढ़ना सुखद ही होगा. आधुनिकता के वशीभूत गाँवों के विलुप्त होते जाने के दौर में  ग्रामीण अंचल की जीवनशैली को बाड़ा के माध्यम से प्रस्तुत करना लेखक का सराहनीय एवं स्तुत्य प्रयास है. इस कृति का साहित्यजगत में भरपूर स्वागत होना ही चाहिए. 


समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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कृति : बाड़ा (उपन्यास)
लेखक : लखनलाल पाल
प्रकाशक : नीरज बुक सेंटर, दिल्ली-92
संस्करण : प्रथम, 2016
ISBN : 978-93-83625-23-9


रविवार, 27 मार्च 2016

स्नेह-विश्वास के पारम्परिक आधार पर लिव-इन का निर्माण



स्त्री-पुरुष सम्बन्ध किसी कृति के केंद्र में हों तो उसमें स्वतः ही अनेक विमर्श जन्म लेने लगते हैं और यदि उस कृति में लिव-इन रिलेशन जैसी अवधारणा हो तो संभावनाओं के कई-कई आयामों को तलाशा जाने लगता है. अपनी पहली औपन्यासिक कृति अँधेरे का मध्य बिंदु में वंदना गुप्ता ने ऐसे विषय को चुना जो पश्चिम सभ्यता-संस्कृति के कारण उन्मुक्त संबंधों, रिश्तों की वकालत करता है. पश्चिम आयातित इस सम्बन्ध ने भारतीय समाज में भी अपनी जड़ों को फैलाना शुरू कर दिया है, बावजूद इसके भारतीय समाज में इसे सहजता से स्वीकार नहीं किया जा रहा है. इसके पीछे लिव-इन रिलेशन में उन्मुक्त संबंधों का निर्माण, पश्चिमी यौन-संस्कृति का अनुपालन, गैर-जिम्मेवारी का भाव पैदा होना, रिश्तों के नामकरण से दूर महज शारीरिक सुखों का उपभोग करना आदि माना जा रहा है. यद्यपि पारिवारिक सहमति से निर्मित विवाह संस्था का स्वरूप वर्तमान युवा-वर्ग ने प्रेम-विवाह के द्वारा बहुत हद तक परिवर्तित किया है तथापि लिव-इन रिलेशन के द्वारा वे विवाह स्वरूप को खंडित कर पायेंगे, कहना मुश्किल प्रतीत होता है.

लिव-इन रिलेशन के प्रति समाज की सोच को जानते हुए भी वंदना जी ने अपनी पहली ही कृति में इस विषय पर कलम चलाई, इसे अवश्य ही प्रशंसनीय कहा जा सकता है. उपन्यास की कथा एक आदर्शात्मक स्थिति में ही गतिमान रहते हुए इस संबंध के सुखद अंत को परिभाषित करके ही रुकी. इसे संभवतः लेखिका का वो भय कहा जा सकता है जो उनकी स्वीकारोक्ति लिव-इन संबंधों की घोर विरोधी होते हुए भी जाने क्यों कलम ने यही विषय चुना. शायद यही मेरी सबसे बड़ी परीक्षा थी, जिन संबंधों को मैं कभी स्वीकार नहीं कर सकती उसी पर कलम चलाई जाए जो आसान कार्य नहीं था. में परिलक्षित होता है. कथा नायक रवि और कथा नायिका शीना के संबंधों का, रिश्तों का निरंतर सुखमय रूप से चलते रहना, उनके आपसी स्नेह, विश्वास, समन्वय, सहयोग का बने रहना किसी अन्य दूसरे लिव-इन रिलेशन रिलेशन की सफलता की गारंटी नहीं माना जा सकता है. जिस विश्वास, रिश्ते की गरिमा, अपनेपन, सहयोग की भावना का विकास इन दोनों के अनाम रिश्ते में दिखाया गया है, वो किसी भी सम्बन्ध की सफलता होते हैं. संभवतः लेखिका के मन-मष्तिष्क में खुद के इस सम्बन्ध के विरोधी होने का प्रतिबिम्ब बना हुआ था और इसी कारण से जाने-अनजाने वे लिव-इन रिलेशन की कमियों, दोषों को प्रदर्शित करने से बचती रहीं हैं. एकाधिक जगहों पर जहाँ भी ऐसा अवसर आया वहाँ अपनी मौलिकता से लेखिका ने उन्हें उभरने का अवसर नहीं दिया. ऐसे अवसरों के अलावा उपन्यास की कथा में अन्य दूसरे वैवाहिक संबंधों को कटुता, अहंकार, झगड़े, अविश्वास से भरे दिखाये जाने के पीछे लिव-इन रिलेशन को सफलता और वैवाहिक संबंधों को असफलता की तरफ ले जाने वाला समझ आता है. सदियों से चली आ रही विवाह संस्था में समय के साथ कई-कई विसंगतियाँ देखने को अवश्य मिली हैं किन्तु इसके बाद भी न केवल भारतीय समाज में वरन विदेशी समाज में भी वैवाहिक संबंधों को सहज मान्यता प्राप्त है. ऐसे समाजों में बहुतायत दंपत्ति ऐसे हैं जो ठीक उसी तरह का जीवन-निर्वहन करते हुए अनुकरणीय बने हैं जैसे कि रवि और शीना बने.

कथा के बीच वंदना जी ने एकाधिक अवसरों पर जानकरी देने का अनुकरणीय कार्य किया है. भले ही कई पाठकों को कहानी में मध्य में समाजोपयोगी तथ्यों का आना बोझिल अथवा अनुपयोगी जान पड़े किन्तु समालोचना की दृष्टि से इसमें और विस्तार की सम्भावना दिखती है. रवि शीना के संबंधों के आरम्भ में परिवार नियोजन की चर्चा, शीना के एचआईवी संक्रमित हो जाने पर चिकित्सकीय परामर्श, आदिवासी परम्परा का उल्लेख, कतिपय असफल लिव-इन संबंधों की चर्चा आदि को इस रूप में देखा जा सकता है. इसके अलावा वंदना जी की लेखनी की प्रशंसा इस रूप में भी की जानी चाहिए कि लिव-इन रिलेशन जैसा विषय चुनने के बाद भी वे रवि शीना के संबंधों का अत्यंत शालीनता के साथ उत्तरोत्तर विकास करती रही हैं. उनके पास इन संबंधों के नाम पर उन्मुक्तता, शारीरिक संसर्ग, मौज-मस्ती आदि के प्रस्तुतीकरण का विस्तृत कैनवास था किन्तु इसके उलट उनकी संतुलित लेखनी का परिचय मिला है. परंपरागत भारतीय समाज इन संबंधों को किस रूप में स्वीकारेगा, आधुनिकता में रचा-बसा युवा-वर्ग इसका विस्तार किस तरह करेगा, जिम्मेवारी से मुक्त इस सम्बन्ध में जिम्मेवारी का कितना भाव जागृत होगा ये तो भविष्य के गर्भ में छिपा है. वर्तमान में जिस तरह से विवाह संस्था में विसंगतियाँ देखने को मिल रही हैं, कुछ हद तक ऐसा ही लिव-इन रिलेशन में भी हो रहा है. यदि इन संबंधों में सब कुछ सामान्य अथवा अनुकरणीय होता तो लिव-इन संबंधों के बहुतायत मामलों में पुलिसिया कार्यवाही न हो रही होती. 

भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, उसे भविष्य पर छोड़ते हुए वंदना जी की कलम की, उनके विषय चयन की, भाषा की सरलता की, कथ्य की सहजता की, कथा गतिशीलता की, शाब्दिक चयन की, प्रस्तुतीकरण की सराहना करनी ही पड़ेगी. कृति की सफलता इसी में है कि या तो वो समुचित, सकारात्मक समाधान प्रस्तुत करे अथवा संभावनाओं के, विमर्श के नए द्वार खोले. अंत में लालित्य जी के अनुसार सबको पसंद आने वाले वाक्य तुम्हें फोल्ड कर के  अपनी पॉकेट में रख लूँ जहाँ-जहाँ जाऊँ वहाँ-वहाँ तुम मेरे साथ हो. को रवि शीना संबंधों के सापेक्ष प्रेमपरक कहा जा सकता है, इसकी प्रेम तासीर में मदहोश हुआ जा सकता है. इसके ठीक उलट यदि इसी वाक्य को स्त्री-विमर्श के, पति-पत्नी के संबंधों के नजरिये से देखा जाये तो स्त्री के प्रति गुलाम मानसिकता को, पुरुष द्वारा उसे अपनी जेब में रखे रहने को परिलक्षित करने लगता है. सहमतिपूर्ण वैवाहिक सम्बन्ध, प्रेम-विवाह, लिव-इन रिलेशन आदि कुछ इसी तरह के नजरिये को समेटे समाज में विचरण कर रहे हैं, जो आपसी प्रेम, स्नेह, सहयोग, समन्वय, विश्वास के आधार पर सफल, असफल सिद्ध हो रहे हैं.

समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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कृति : अँधेरे का मध्य बिंदु (उपन्यास)
लेखिका : वन्दना गुप्ता
प्रकाशक : एपीएन पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली
संस्करण : प्रथम, 2016
ISBN : 978-93-85296-25-3
 

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

देहरी के अक्षांश पर सतत सक्रिय स्त्री


          ‘मुट्ठी भर सपनों/और अपरिचित अपनों के बीच/देहरी के पहले पायदान से आरम्भ होती है/गृहणी के जीवन की/अनवरत यात्रा’ महज यात्रा नहीं होती वरन अनेकानेक संसारों को रचते-सँवारते हुए उन्हें शिखर पर पहुँचाने का आख्यान होती है. देहरी के अक्षांश पर खड़े होकर एक स्त्री भले ही ‘स्त्रीत्व और अस्तित्व’ को लेकर अपने आप से ‘एक प्रश्न’ करे ‘कि कितनी मैं बची हूँ मुझमें’, भले ही अपने आपको निरुत्तर समझे, अपने आपको ‘अनुबंधित परिचारिका सी’ मानते हुए किसी वीतरागी की तरह हर बार अनाचार सह जाती हो किन्तु सत्यता यही है वही ‘स्त्री हर रूप में आलोकित/करती है आँगन को/सजाती है दीपमालाएँ/बिखेर देती है प्रकाश/छत-मुंडेरों पर/और दमक उठता है/सबका जीवन.’ डॉ० मोनिका शर्मा अपने कविता-संग्रह ‘देहरी के अक्षांश पर’ के द्वारा स्त्री के विविध पहलुओं को उभारती हुई उन्हें कविता रूप में प्रदर्शित करती हैं. आलोचना की दृष्टि से संग्रह की रचनाओं को कविता कहना उन रचनाओं के मर्म को, भाव-बोध को कम करना ही होगा, उनके भीतर रची-बसी एक स्त्री की अंतर्वेदना, उसकी संवेदना, उसकी विलक्षणता को नकारना सा होगा. मोनिका शर्मा का ये कहना कि “कुछ देखा जिया सा शब्दों में ढालना हो तो कविताएँ सोच समझकर नहीं लिखी जातीं. मन को छूने और ह्रदय को उद्वेलित करने वाला हर भाव स्वतः शब्दों में बंधकर कविता का स्वरूप ले लेता है.” स्पष्ट करता है कि उनकी रचनाएँ महज कविता नहीं बल्कि एक स्त्री के जीवन के विविध रंग-रूप का भावनात्मक चिंतन है. 

          गृहणी की अनवरत यात्रा से आरम्भ उनका कविता-संग्रह शिखर के अकेलेपन तक जाता है गृहणी तो है ही बेटी भी है, माँ भी है, परिवार भी है और सबसे बड़ी बात कि ‘स्त्रियों का संसार’ भी है, ‘स्त्री की छवि’ भी है, ‘स्त्री का अस्तित्व’ भी है, स्त्री का स्त्री होना भी है. इस होने में, समझने में, अनुभूत करने में उनकी देखी हुई, एहसास की हुई, जी हुई स्त्री सिर्फ शोषित नहीं है, सिर्फ प्रताड़ित नहीं है; वह सिर्फ ‘पीड़ा’, ‘नैराश्य’, ‘संबंधों का दर्द’ ही नहीं सह रही है वरन एक ‘असाधारण भूमिका’ में है. इस भूमिका में वो ‘सूत्रधार’ है और सगर्व उद्घोष सा करती है ‘सूत्रधार हूँ और सहायिका भी/.... सहेज कर रखती हूँ अपनी ऊर्जा/मुश्किलों से रूबरू रहने का आदम विश्वास/ताकि गतिशील रहे सभी का जीवन.’ उनकी स्त्री महज उद्घोष ही नहीं करती वरन ‘स्त्री हूँ मैं/मेरे शब्दों में दमकता है अंतर्मन का ओज/मुट्ठियों में पकड़ रखी है/आत्मविश्वास की रस्सी/मन चेतना से लबालब है/और तन है दृढ़ता से पूरित/मुझे शिखर पर नहीं जाना/मुझे तो विस्तार पाना है.’ का पथ प्रशस्त करती हुई अपने स्त्री होने पर गर्व करती है. 

          मोनिका शर्मा की स्त्री चहारदीवारी के भीतर की दुनिया में रंग भरने के लिए, अपने घर-आँगन को सजाने के लिए तत्पर दिखती है; अपने आपको गृहणी की भूमिका में देखकर अपनी उपलब्धियों को संदूक में दफ़न सा कर देने की अदम्य क्षमता रखती है; घर-परिवार की धुरी होते हुए भी खुद को अधूरी सा अनुभव करती है इसके बाद भी वो नैराश्य के गहन अन्धकार में विलुप्त नहीं हो जाती है. वो जागृत अवस्था में दिखती है, कभी अपने लिए, कभी अपने अंश के लिए. जिम्मेवारियों, अंतहीन दायित्वों के बोध से परिपूर होने के बाद भी वो स्त्री ‘संबंधों के सवाल’ उठाती है. सम-विषम होती जा रही भावनाओं के बीच भी वो भावनात्मकता को जिन्दा रखते हुए वो स्त्री अपनी भावी पीढ़ी को जगाने का काम भी पूरी दृढ़ता से करती है. यद्यपि ‘आखिर क्यों जन्में बेटियां?’ के द्वारा मोनिका शर्मा ने न केवल स्त्री मन की वरन समाज के प्रत्येक संवेदित दिल की भावना को सामने रखा है साथ ही ‘क्यों बढ़ाये कोई स्त्री तुम्हारी वंश-बेल?/जब तुम खेलते हो ये तिरस्करणीय खेल/शक्ति-स्वरूपा कहते-कहते/रक्त-रंजित करते हो उनका अस्तित्व/और अमानुष बन/अनावृत करते हो उनकी देह.’ जैसे कठोर वचनों के द्वारा पुरुष-प्रधान समाज पर, अपनी वंश-बेल वृद्धि के लिए सिर्फ पुत्र-जन्म को लालायित समाज पर भी प्रहार भी कहती हैं. वे ‘क्यों अभिव्यक्ति की/संभावनाओं से परे/केवल सुनना और हर मत को/निर्विरोध स्वीकार लेना सीख लेती हैं’ के द्वारा यदि स्त्री बेटियों के तर्क, उनकी ऊर्जा को प्रश्नचिन्ह के घेरे में खड़ा करके उनमें आत्मबोध जगाना चाहती है तो ‘कुछ बनो ना बनो/निर्भीक बनो/स्वयं को हरगिज नहीं खोना’ के द्वारा बेटियों को निडरता सिखाती हैं.

          ‘देहरी के अक्षांश पर’ की रचनाएँ स्त्री के रोजमर्रा की भूमिका का चित्रण करती हैं. इन रचनाओं को घर-बाहर कई-कई भूमिकाओं में कार्यरत दिखती स्त्री, जिम्मेवारी से परिपूर्ण स्त्री, दायित्व-बोध में उलझी-लिपटी स्त्री की सहजता से असहजता, सामान्यता से असामान्यता, समानता से विषमता, कोमलता से कठोरता, सुख से नैराश्य आदि-आदि का शब्द-चित्र कहा जा सकता है. सामान्य स्त्री की विभिन्न भूमिकाओं, उसकी भावनाओं, उसके यथार्थ को सामने लाने के लिए कवियत्री ने कोमलकांत शब्दों के द्वारा ही रचनाओं को पद्य-रूप प्रदान किया है. सामान्य, सहज, रोजमर्रा के शब्दों के कारण पाठक सामान्य रूप से, सहजता से कविताओं के साथ तादाम्य बैठा लेता है. ये लेखिका की लेखनी और वैचारिकता की सफलता ही कही जाएगी कि सामान्य स्त्री के जीवन का आख्यान अत्यंत सरलता, सहजता से दिल तक अपनी पैठ बना लेता है और फिर उसी के रास्ते पाठकों के मन-मष्तिष्क को उद्वेलित भी करता है.

समीक्षक – डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर


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कृति : देहरी के अक्षांश पर  (कविता संग्रह)

लेखिका : डॉ० मोनिका शर्मा

प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर

संस्करण : प्रथम, अगस्त 2015 

ISBN : 978-93-84979-57-7

शनिवार, 31 अक्तूबर 2015

चुभती हैं कुछ किरिचें 'काँच के शामियाने' की

“आंचलिक बोली के चुटीलेपन के साथ रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं के ताने-बाने से बुनी इस कथा में हर लड़की कहीं-न-कहीं अपना चेहरा देख पाती है. यही इस उपन्यास की सार्थकता है.” सुधा अरोड़ा द्वारा रश्मि रविजा के पहले उपन्यास ‘काँच के शामियाने’ भूमिका की मानिंद लिखी ये पंक्तियाँ पढ़ने के बाद आँखें समूचे उपन्यास में रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं के ताने-बाने को तलाशती हैं. छोटी-छोटी घटनाओं का ताना-बाना मिलता है मगर इस कदर उलझा कि महज एक परिवार या फिर कहें कि पति-पत्नी के मध्य ही सिमटा नजर आता है. एक समीक्षक की दृष्टि से मेरा मानना है कि कम से कम ऐसे ताने-बाने में कोई भी लड़की अपना चेहरा नहीं देख पाती होगी. रश्मि रविजा का ये पहला उपन्यास है और जिस तरह की उनकी लेखनी, उनके विषय, उन विषयों की गंभीरता उनके ब्लॉग अथवा सोशल मीडिया की अन्य दूसरी सामग्री में देखने को मिलती है वैसी कसावट, वैसी गंभीरता इस उपन्यास में देखने को नहीं मिलती है.

यदि इस उपन्यास को एक ऐसी स्त्री की नजर से देखा जाये जो अपने पति, ससुराल से प्रताड़ित हो; अपना अस्तित्व बचाए-बनाये रखने को संघर्षरत हो; लगातार विषम परिस्थितियों के बाद भी वो न सिर्फ अपना विकास करती है वरन अपने बच्चों का भी विकास करती है तो निश्चित ही ये उपन्यास ऐसे ताने-बाने का निर्माण करता है. एक युवती का विवाह, विवाह पूर्व ही पति के स्वभाव को लेकर आशंका, उस आशंका का सही निकलना, पति के साथ-साथ ससुराल वालों का नित्य प्रति प्रताड़ना देना, युवती के परिजनों द्वारा ससुरालीजनों की शिकायत करना, परिस्थितियों के वशीभूत उस लड़की का वापस ससुराल आना, ससुरालियों का स्वार्थवश तात्कालिक रूप से स्वभाव परिवर्तन होना, इन्हीं विषम परिस्थितियों में तीन-तीन बच्चों का जन्म होना, मार डालने तक के हालात बनने के साथ-साथ तीनों बच्चों सहित आत्महत्या करने जैसी स्थिति का उत्पन्न हो जाना और अंततः उस युवती का अपने तीनों बच्चों सहित पति का घर हमेशा-हमेशा के लिए छोड़कर आत्मनिर्भर बनने की कवायद करना, नया संघर्ष छेड़ना अवश्य ही कृति को कथा-प्रवाह देता है. इसके बाद भी इस कथा-प्रवाह में कई-कई अवरोध औपन्यासिक विकास में बाधक बनते हैं.  

ये किसी भी रूप में समझ से परे है कि किसी भी कालखंड में, देशकाल में कोई युवक (राजीव) महज इस कारण से किसी युवती (जया) से विवाह करेगा क्योंकि जया ने राजीव के प्रेम-निवेदन को ठुकरा दिया था. इसे उपन्यास विकास में बाधक इस कारण से कहा जा सकता है क्योंकि पूरे उपन्यास में राजीव के चरित्र का विस्तार नहीं किया गया है. कहीं भी लेखिका द्वारा उसको दुश्चरित्र नहीं दिखाया गया है. यदि लेखिका द्वारा राजीव के चरित्र को कुछ इस तरह से उभारा गया होता कि उसके कई-कई लड़कियों से सम्बन्ध हैं, उसने कहीं और विवाह कर रखा है तब जया से बदला लेने का मंतव्य कुछ हद तक स्पष्ट हो सकता था. इसके अलावा भी कुछ अन्य परिस्थितियों का निर्माण लेखिका द्वारा बदला लेने के कारक के सम्बन्ध में किया जा सकता था. इसके अलावा किसी पिता का अपनी ही संतानों से इस हद तक नफरत करने के कारण भी लेखिका द्वारा सामने नहीं रखे गए हैं. राजीव अथवा उसके परिवार वालों द्वारा जया को दुश्चरित्र का आरोप लगाते भी कहीं नहीं दिखाया गया है. ऐसे में राजीव किस कारण से अपने तीनों बच्चों से भयंकर नफरत करता है, समझना कठिन होता है. उसकी नफरत इस कदर उग्र रूप धारण करती है कि अपनी ही बेटी के बारे में सोचना ‘बच गई ये. हम तो इसके ऊपर जाने की खबर का इंतज़ार कर रहे थे और सोच रहे थे, छुट्टी लेना पड़ेगा.’ और एक दूसरी बेटी को फेंकने की घटना राजीव की नफरत की भावना को स्पष्ट नहीं करती हैं. यदि लेखिका द्वारा घर से बाहर के चंद दृश्यों को समाहित किया गया होता जिसके द्वारा कथा-प्रवाह का वातावरण निर्मित होता तो संभवतः कुछ स्पष्टता परिलक्षित होती.  


रश्मि जी की वर्तमान कृति संभवतः उनकी आरंभिक वय में समाज के देखे-सुने अनुभवों का प्रस्तुतीकरण है क्योंकि कालखण्ड, वातावरण वर्तमान से बहुत पीछे का एहसास कराता है. यदि उपन्यास के कालखण्ड (जिसके बारे में लेखिका ने कहीं स्पष्ट रूप से नहीं लिखा, महज घटनाओं, कथा के सहारे स्पष्ट होता है) को देखा जाये तो एक ऐसे समय में जबकि फोन कॉलोनी भर में किसी एक घर में हो, बैंक में पाँच हजार रुपये महीने का वेतन भी बहुत हो तब किसी शोषित स्त्री का अपने तीन-तीन बच्चों सहित पति का घर छोड़कर चले आना, छोटे-छोटे कार्यों के द्वारा स्व-विकास करना, अदालती कार्यवाही का सामना करना, दुष्ट पति के प्रत्येक प्रताड़ित करने वाले क़दमों का साहस के साथ सामना करना यकीनन किसी भी महिला के सशक्त होने को प्रदर्शित करते हैं. किसी भी कृति की सफलता-असफलता, उसकी कथा की स्वीकार्यता-अस्वीकार्यता किसी समीक्षा के बजाय पाठकों पर निर्भर करती है. जहाँ रश्मि रविजा का पहला उपन्यास शोषित स्त्री को हताश न होने देने, संघर्षों का मुकाबला करने, विपरीत परिस्थितियों में धैर्य न खोकर स्व-विकास करने का सन्देश देता है वहीं वर्तमान के स्त्री-विमर्श को भी राह दिखाता है. यदि स्त्री को प्रताड़ित करने में पुरुष (या कहें कि उसका पति) आगे है तो कहीं न कहीं महिला (सास, ननद आदि के रूप में) भी शामिल है. यदि स्त्री स्व-विकास करती है तो भी कहीं न कहीं उसके पीछे पुरुष (भाई, जीजा आदि) सहित महिला (माँ, दीदी आदि) भी शामिल होते हैं. समाज महज बुरे लोगों से नहीं भरा है और न ही सभी जगह अच्छे लोग मिलते हैं. प्रत्येक स्त्री ही शोषित नहीं है और न ही प्रत्येक पुरुष शोषण करने में लगा हुआ है. ऐसे में यदि ‘काँच के शामियाने’ की हलकी-फुलकी किरिचें नजरअंदाज कर दी जाएँ तो कथा अपना सन्देश देने में कुछ हद तक सफल अवश्य होती है. पाठकों को रश्मि जी से अपेक्षा रहेगी कि वे जल्द ही इसके संशोधित संस्करण से तमाम किरिचों को दूर कर कृति को चरम पर ले जाएँगी. 

समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर 






कृति : काँच के शामियाने (उपन्यास)
लेखिका : रश्मि रविजा
प्रकाशक : हिन्द युग्म, नई दिल्ली
ISBN : 978-93-84419-19-6
संस्करण : पहला (2015)

रविवार, 5 अप्रैल 2015

वेदबुक से फेसबुक तक स्त्री : महिला-स्थिति को बयान करती पुस्तक


वर्तमान में जबकि सूचना क्रांति के साधन तीव्रता से सबके हाथों में पहुँच रहे हों; आधुनिकता के वशीभूत समाज की परम्पराएँ ध्वस्त होने की कगार पर हों; नियम-परिपाटी को कहीं हाशिये पर लगाकर निश्चित मानदंडों को विखंडित किया जा रहा हो; बंधी-बंधाई परिभाषाएं बदलने की कोशिशे जारी हों ऐसे समय में स्त्री की स्थिति पर लेखन का कार्य दुरूह भले ही न कहा जाये किन्तु जीवटता वाला अवश्य ही कहा जायेगा. तलवार की धार पर चलने से समान कार्य उस समय और भी दुष्कर हो जाता है जबकि कालखंड को वेदबुक से फेसबुक तक निर्धारित किया गया हो. इसके लिए निश्चित ही पुस्तक के लेखक पुनीत बिसारिया जी बधाई के पात्र हैं. अनेक नवीन विषयों को उदघाटित करने वाले सुप्रसिद्ध साहित्यकार पुनीत बिसारिया ने ‘वेदबुक से फेसबुक तक स्त्री’ के द्वारा स्त्री की उड़ान को कलमबद्ध करने का एक साहसिक प्रयास किया है.

स्त्री की दशा का आकलन करने के लिए लेखक ने वैदिक युग से उसकी यात्रा को आरम्भ किया है. उनके द्वारा वैदिक युग की स्त्रियों के विद्याध्ययन की स्वतंत्रता, सैन्य शिक्षा ग्रहण करने के उदाहरण दिए गए हैं. लोपामुद्रा, रोमसा, घोषा, सूर्या, अपाला, विलोमी, सावित्री, यमी, विश्वंभरा, श्रद्धा, कामायनी, देवायनी आदि के द्वारा दर्शाया गया है कि उस कालखंड में महिलाओं को सम्मानजनक स्थान प्राप्त था. लेखक ने इस बात के भी स्पष्ट प्रमाण दिए हैं कि वैदिककालीन महिलाओं के साथ ही दुर्व्यवहार आरम्भ हो गया था. इसके लिए वे लिंगपुराण का सन्दर्भ देते हैं. ये अपने आपमें आश्चर्य का विषय है कि जिस कालखंड में अनेक विदुषी महिलाओं ने शास्त्रार्थ द्वारा पुरुषों को पराजित किया हो उस कालखंड में स्त्रियों की दशा में गिरावट भी देखने को मिलती है.

मध्यकाल तक आते-आते स्त्रियों की स्थिति और भी बिगड़ गई. इसके उदाहरण में लेखक ने मनुस्मृति (5/154), याज्ञवल्क्य (7/77), रामायण (अयोध्याकाण्ड 24/26 27), महाभारत (अनु०प० 146/55), अश्वमेध पर्व (90/910), शांति पर्व (148/6, 7), मत्स्य पुराण (210/18), आदि को उदाहरण के रूप में सामने रखा है. बौद्धकालीन, मौर्यकालीन महिलाओं की दशा भी उन्नत नहीं थी और रही सही कसर मुस्लिम आक्रान्ताओं ने पूरी कर दी. पर्दा प्रथा, बाल विवाह, सती प्रथा, जौहर प्रथा आदि कुरीतियों का उत्सर्ग इसी समय में देखने को मिलता है. बालिकाओं की शिक्षा पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया. लेखक ने इस विषम स्थिति को दर्शाने के साथ-साथ इस कालखंड की कई शिक्षित महिलाओं के उदाहरण भी सामने रखे हैं जिन्होंने अपने प्रयासों से राजनीतिक घटनाक्रमों में अग्रणी भूमिका निभाई थी. रानी विद्या, रानी दुर्गावती, रानी कर्णवती, ताराबाई, देवलरानी, रूपमती, पद्मिनी, रज़िया सुल्तान आदि के द्वारा लेखक ने तथ्यात्मकता दर्शाई है. लेखक ने अपनी पुस्तक में  ये संकेत देकर कि मुस्लिम स्त्रियाँ तभी बाहर निकलती थीं जब वे अत्यधिक निर्धन हों अथवा लज्जाहीन हों लेकिन वे भी अपना सर ढंके रहती हैं, दर्शाने का प्रयास किया है कि हिन्दू महिलाओं की तुलना में मुस्लिम महिलाओं की स्थिति अधिक ख़राब थी.

स्त्रियों की दशा के सम्बन्ध में ‘स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है’ जैसे वाक्य को स्त्री-विमर्श का ब्रह्म वाक्य सा घोषित कर दिया गया है और कदाचित लेखक भी इसी के इर्दगिर्द भटकता सा दिखा. स्त्री-विमर्श को एक आन्दोलन के रूप में चित्रित करने के अपने सफल प्रयास में लेखक ने महज पश्चिमी सन्दर्भों में स्त्री-विमर्श को तलाशने का प्रयास किया. भारतीय सन्दर्भों में आधुनिक स्त्रियों के रूप में प्रस्तुत लेखक के सन्दर्भ कहीं से भी भारतीय स्त्री-सशक्तिकरण की धार को मोथरा नहीं होने देते हैं. ये पुनीत बिसारिया की विशेष दृष्टि रही है कि उन्हों ने अपने आपको उन आरोपों से मुक्त रखने में सफलता पाई है, जैसा कि तमाम महिला मुक्ति संगठनों की महिलाएं लगाती हैं, कि पुरुषों द्वारा स्त्री-विमर्श, स्त्री-सशक्तिकरण का प्रस्तुतीकरण इस रूप में किया जाता है कि जिससे उसकी धार को मोथरा किया जा सके. सावित्री बाई फुले से आरम्भ हुई उनकी यात्रा में रमाबाई रानाडे भी शामिल हैं, पंडिता दयाबाई की भूमिका को भी स्पष्ट रूप से चित्रित किया गया है, मुस्लिम शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए अग्रणी भूमिका निभाने वाली बेगम वाहिद जहाँ खां के योगदान को भी लेखक ने यथावत सामने रखा है.

सम्पादकीय हस्तक्षेप से दूर सोशल मीडिया के इस शक्तिशाली मंच ‘फेसबुक’ ने स्त्री-पुरुष को वैचारिक उड़ान का अनन्त आकाश उपलब्ध करा दिया है. इस आकाश में स्त्रियों के कई-कई रूप अपनी-अपनी उड़ान भरते, कुलाचें भरते दिखाई देते हैं. ‘वेदबुक से फेसबुक तक स्त्री’ का सबसे प्रभावशाली और सर्वाधिक दुरूह पड़ाव फेसबुक की स्त्री को परिभाषित करने में समझ आता है. फेसबुक पर सक्रिय या कहें कि अपनी उपस्थिति को दर्शाने वाली महिलाओं की श्रेणियों का विभाजन करते में लेखक ने अतिरिक्त सतर्कता बरतने का प्रयास किया है, जो उनकी शोधपरक दृष्टि को ही इंगित करता है. महिलाओं के प्रति अतिशय उन्मुक्तता दर्शाने वाली मानसिकता यहाँ है तो महिलाओं को महिला समझकर अपने अस्तित्व पर गर्व कराने का बोध जगाने वाली महिलाएं भी हैं. ये कह देना कि हम जो अपने घरों से एक बार बाहर निकले हैं, तो अब वहाँ लौटकर नहीं जायेंगे, महिलाओं की स्वतंत्रता का बेजा इस्तेमाल करने की तरफ प्रेरित करने जैसा ही है. इस बेजा स्वतंत्रता को भी पकड़ने वाली और उनसे माता-पिता को सचेत करने वाली लेखिकाएं फेसबुक पर बेबाक राय देती हैं.

लेखक ने फेसबुक पर स्त्री को उसी के बरअक्श देखने के प्रयास में निरपेक्ष दृष्टि अपनाने का भरपूर प्रयास किया है किन्तु मानवीय स्वभाव बिना भटके मानता नहीं है और कभी-कभी परिस्थियाँ ऐसा करवा देती हैं. संभवतः लेखक के स्थिर मन को भटकाने में नई दिल्ली में १६ दिसंबर २०१२ को हुए घनघोर अमानवीय कृत्य ने अपना असर दिखाया और दिल दहलाने वाले इस कृत्य ने लेखक को अपने आसपास ही सिमटा लिया. इसी के चलते लेखक फेसबुक की स्त्री को दिल्ली काण्ड के आसपास समेट बैठे हैं और बहुत सी जानी-अनजानी बातों को वे जाने-अनजाने में छिपा सा गए हैं. संभव है कि ऐसा करने के पीछे उनकी मंशा सामाजिक सद्भाव को स्थापित करना ही रहा हो क्योंकि फेसबुक की तमाम स्त्रियों की चर्चा करते वे दिखते हैं किन्तु गैर-हिन्दू महिलाओं की दशा-दिशा पर चर्चा करने में किंचित संकोच दर्शाते हैं. कुछ ऐसा ही संकोच वे धार्मिक ग्रंथों में महिलाओं की स्थिति के सन्दर्भ को चित्रित करने में दिखाते हैं. संस्कृत, बौद्ध, जैन ग्रंथों को विस्तृत रूप से सामने रखते हैं किन्तु मुस्लिम ग्रंथों के प्रति परहेज करते दिखते हैं. फेसबुक का एक कथन कि ‘स्त्री का रहस्मय रूप ही पुरुष को सबसे अधिक मान्य है. जिसका हम वर्णन नहीं कर पाते उसे रहस्मय बना देते हैं. रहस्मय बनाने का अर्थ है स्त्री को न समझना’  भी लेखक की रहस्मयता को बनाये रखता है. लेखक द्वारा वर्गीकृत स्त्री अपने आकाश को असीमित रूप से विस्तृत करने में जिस तरह से फेसबुक से जुड़ी है, उसे देखते हुए इस बिंदु पर अध्ययन के और भी कई आयाम, नए-नए आधार निर्मित किये जा सकते हैं. अपने आपमें विशुद्ध अछूते विषय को उठाकर पुनीत बिसारिया ने अनूठा कार्य किया है जो न केवल स्त्री-विमर्श की नवीन संकल्पना को तैयार करेगा वरन शोधार्थियों के लिए भी अनुसन्धान के नए द्वार खोलेगा. फेसबुक पर इस तरह के सन्देश तो बहुतायत में मिल जाते हैं कि ‘यदि आप पुरुष हैं तो स्त्री का सम्मान करें. अगर आप स्त्री हैं तो अपने स्त्रीत्व पर गर्व करें’ किन्तु किसी भी ऐसे सन्देश का जिक्र नहीं मिलता कि यदि आप महिला हैं तो पुरुष का सम्मान करें और दूसरी स्त्री को भी सम्मान दें, संभवतः लेखक की अगली पुस्तक-यात्रा में ऐसा कुछ पढ़ने को मिले? ‘वेदबुक से फेसबुक तक स्त्री’ की यात्रा कहीं-कहीं भले अधूरी सी दिखाई दे किन्तु ये लेखक की असफलता नहीं वरन विचार-विमर्श के वे बिंदु हैं जिनके द्वारा तर्क-वितर्क करके और आगे तक जाया जा सकता है.

लेखक को सफलता की शुभकामनाओं और स्त्री-शक्ति,मातृ-शक्ति को उसके गौरवशाली भविष्य की राह निर्मित करने की मनोकामनाओं के साथ अपेक्षा है कि स्त्री यात्रा का ये चरण समाज को जगाने की दिशा में सार्थक कदम सिद्ध हो. 
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डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर 
सम्पादक - स्पंदन, मेनीफेस्टो