गुरुवार, 17 अगस्त 2017

पारिवारिकता का नेफ्रो वार्ड

परिवार का आधार प्रेम-विश्वास पर आधारित होता है। इसमें भी पति-पत्नी का रिश्ता अत्यंत गंभीर माना गया है। पति-पत्नी का रिश्ता आपसी प्रेम विश्वास की पवित्र डोर के साथ जुड़ा होता है। इस पवित्रता का एहसास अपनी विशालता को न केवल इस जन्म में बल्कि सात जन्मों तक, जन्म-जन्मान्तर तक बनाये रखने को प्रेरित करता है। पति-पत्नी के रिश्तों का ताना-बाना, उनके आपसी सम्बन्ध को, विश्वास को कथाकार सुरेन्द्र नायक ने समीक्ष्य उपन्यास नेफ्रो वार्ड में बखूबी दिखाया है। वर्तमान के साथ अतीत की गलियों में यात्रा करवाते हुए कथाकार ने उपन्यास के नायक-नायिका मधुर-प्रीति के अलग-अलग पक्षों को सामने रखा है। किसी भी इन्सान की जीवन-यात्रा किन-किन बिन्दुओं का स्पर्श करते हुए कितने पड़ावों से गुजरेगी, किस मंजिल पर जाकर ठहरेगी उसे स्वयं ही इसका आभास नहीं होता है।

यंत्रवत चलती ज़िन्दगी आगे बढ़ती होकर भी रुकी हुई सी प्रतीत होती है तो अकसर इन्सान गलतियाँ कर बैठता है। संबंधों और रिश्तों की गरिमा का ध्यान किये बगैर अकसर वह ऐसे कदमों को उठा लेता है जो उसके जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित करते हैं। नेफ्रो वार्ड के मधुर और प्रीति जीवन में सतत प्रवहमान रहने के बाद भी एक स्थान पर खड़े से दिखते हैं। दोनों के अपने-अपने सत्य हैं और दोनों के अपने-अपने वैचारिक द्वंद्व हैं जो उन दोनों को एक साथ रखते हुए भी एक साथ जोड़े रखने में असफल प्रतीत होते हैं। नेफ्रो वार्ड जीवन की कथा को उसी के ताने-बाने में लिपटा दिखाता है। यहाँ जीवन का विस्तार है तो संबंधों का संकुचन भी है। यहाँ वैयक्तिक विकास है तो चारित्रिक पतन भी है। यहाँ प्रतिभा का शिखर भी है तो उसका ह्रास भी है। उसमें आगे बढ़ने की ललक भी है तो वापस लौटने की चाह भी है। यदि स्थिति की सरलता है तो वैचारिकी की जटिलता भी है। आपसी कड़वाहट भी है तो आपसी समर्पण भी है। अपनों का बेगानापन है तो बेगानों का अपनापन भी है। संबंधों का नकार भी है तो संबंधों का स्वीकार्य भी है। कथाकार ने अपनी ओर से इन्सान के विविध रंगों को नेफ्रो वार्ड के कमरे की ठंडी अंधियारी स्थिति में दर्शाया है।

कथाकार ने किडनी की गंभीर बीमारी से जूझती प्रीति के सामानांतर संबंधों की क्लिष्टता से जूझते उसके पति मधुर को दिखाया है। बीहड़ के ग्रामीण अंचल की विषादपूर्ण स्थिति में सकारात्मक व्यक्तियों के विश्वास और स्नेह के सहारे आगे बढती प्रीति लगातार विकास की सीढ़ियाँ चढ़ती जाती है। यह अपने आपमें असंगत सा प्रतीत होता है कि विश्वास, प्रेम, सहयोग के कारण ग्राम्य जीवन की बाला प्रीति संबंधों को सीढ़ियाँ बनाकर आगे बढ़ती रहती है। बचपन की कटु स्मृतियों के साये में अपने जीवन को आगे ले जाती प्रीति अपनी महत्वाकांक्षा को न सिर्फ पूरा करती है बल्कि उसके लिए पति-पत्नी के उस रिश्ते को भी नजरअंदाज करती जाती है जिसका आधार स्वयं उसके द्वारा बुना गया था। इसके उलट मधुर संबंधों और रिश्तों की गरिमा का सतत निर्वहन करते हुए लगातार पारिवारिक संरचना को बचाए रखने की जद्दोजहद करता है। इस पार से उस पार पहुँचने का उसका द्वंद्व उसको लगातार परेशान करता रहता है। इसके बाद भी वह धीर-गंभीर स्थिति में भी परिवार की, रिश्तों की, दाम्पत्य जीवन की डोर को न तो छोड़ना चाहता है और न ही तोडना चाहता है। यही कारण है कि मधुर रिश्ते और नौकरी के चयन की स्थिति में भी रिश्ते को थामे रखना बेहतर समझता है। इस स्थिति के बाद भी वह जानता है कि नौकरी को दाँव पर लगाकर वह एक ऐसे रिश्ते को थामे रखने की कोशिश कर रहा है जो उसके हाथ से लगभग फिसल चुका है। मुट्ठी से फिसलती रेत की भांति उसका और प्रीति का रिश्ता भी लगातार फिसल रहा है, बावजूद इसके भी वह चंद रेतकणों को संभालने का जतन कर रहा है।

रिश्तों में विश्वासघात की चोट खाने के बाद, संवेदनाओं को ठुकरा दिए जाने के बाद, मधुरता के कलुषता में परिवर्तित होने के बाद भी मधुर अपनी बीमार पत्नी को तन्हा छोड़ पाने की हिम्मत नहीं कर पाता है। सामान्यजन का रिश्तों को बचाए रखना किस कदर प्राथमिकता में होता है, इसे कथाकार ने मधुर के रूप में दर्शाया है। रिश्तों के लगातार दरकने के बाद भी उन दरारों को भरने का मधुर का प्रयास उसकी प्रीति के प्रति प्रेम की पराकाष्ठा है तो बीमार प्रीति को स्वस्थ करने की उसकी जिद रिश्तों की जीवन्तता का चरम है। मेडिकल साइंस की नकारात्मक स्थिति के बाद भी मधुर अपनी ओर से विश्वास का एक बिंदु भी कमजोर नहीं करता है और अंततः प्रीति को वापस उसी की मनमाफिक दुनिया में ले जाने में सफल होता है। यहाँ कथाकार सुरेन्द्र नायक ने पुरुष के दया, करुणा, प्रेम, समर्पण, सेवाभाव आदि के उन गुणों की उदात्तता को दर्शाया है जिन्हें आमतौर पर साहित्य में न के बराबर स्थान मिला है। सुरेन्द्र नायक ने मधुर के रूप में पुरुष की कठोरतम छवि को तोड़ने का प्रयास किया है और वे बहुत हद तक इसमें सफल होते भी दिखे हैं। समाज में पुरुष की पूर्व निर्धारित छवि पर चोट करते हुए उसे भी संवेदित गुणों से परिपूर्ण दर्शाना अपने आपमें प्रशंसनीय कार्य है।

कथाकार सुरेन्द्र नायक यदि मधुर के रूप में पुरुष को संवेदित गुणों से सुसज्जित करते हैं तो प्रीति के रूप में महिलाओं को जीवट और स्वावलंबी बनने की प्रेरणा भी देते हैं। इसके साथ ही वे ऐसी महिलाओं को परिवार, संस्कार, संस्कृति, रिश्तों से न भटकने की सलाह भी देते हैं। ये और बात है कि कथाकार अपने पुरुष पात्र मधुर को अधिक संवेदित दिखाने के प्रयास में महिला पात्र प्रीति को सबकुछ विस्मृत करवा कर अपने प्रेमी संग सहजता से बेझिझक जाने देते हैं। आधुनिक समाज में विवाहपूर्व सम्बन्ध, विवाहेतर सम्बन्ध, लिव-इन-रिलेशन भले ही सहज रूप में  दिखने लगे हों पर एक पति द्वारा अपनी पत्नी को उसके प्रेमी के साथ चले जाने की, उसके साथ जीवन निर्वहन करने की स्वीकृति देना काल्पनिक, असंभव ही लगता है। कथाकार ने इसी काल्पनिकता के साथ उपन्यास का अंत कर पाठकों को विस्मृत अवश्य किया है। मधुर का सेवाभाव, समर्पण, जिम्मेवारी के बाद प्रीति के परिवर्तन की, ह्रदय में मधुर के प्रति समर्पण की, तमाम विवाहेतर संबंधों के प्रति नकार की स्थिति का अनुमान लगाये बैठे तमाम पाठकों के लिए ऐसा अंत अवश्य ही हतप्रभ करने वाला कहा जायेगा।

विस्तृत फलक पर खड़ा नेफ्रो वार्ड निश्चित रूप से निर्बाध गति से बिना किसी व्यवधान के वर्तमान और अतीत की यात्रा करवाता है। उपन्यासकार द्वारा मधुर और प्रीति के अपने-अपने पक्षों का, चरित्र का, व्यक्तित्व का लगातार विस्तार करवाया गया है। इसके बाद भी तकनीकी रूप से कुछ बिंदु ऐसे हैं जिन पर उपन्यासकार ने अपनी दृष्टि आरोपित नहीं की है। इनमें स्कूल में पढ़ते समय प्रीति की जीवटता का कोई चित्रण न होना, जमींदार के उत्पाती गुर्गों से सबका सशंकित रहना पर उनका कोई उत्पात न दिखना, सबका सहयोग पाने के बाद भी प्रीति का असहयोगी हो जाना, अंतर्मुखी प्रीति का रिश्तों की कद्र न करना, मधुर के प्रति प्रेम-समर्पण होने के बाद भी उससे लगातार दूरी बनाते जाना, परिवार में पिता के होने के बाद भी पिता का कहीं चित्रण न आना आदि प्रमुखता से सामने आता है। ऐसा करने के पीछे उपन्यासकार द्वारा उपन्यास का विस्तार न करना रहा है अथवा जानबूझ कर उसने इन स्थितियों को नजरअंदाज करना, यह तो वही बेहतर बता सकता है। इसके बाद भी नेफ्रो वार्ड के द्वारा उपन्यासकार ने संबंधों की जटिलता, उसकी विषमता, समाज की कड़वी सच्चाई के साथ-साथ रिश्तों का समर्पण, संबंधों का सेवाभाव, व्यक्तियों की सहयोगात्मकता को सरलता से प्रकट कर कथावस्तु को पठनीय बनाया है।

समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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कृति : नेफ्रो वार्ड (उपन्यास)
लेखक : सुरेन्द्र नायक

संस्करण : प्रथम, 2017

मंगलवार, 28 मार्च 2017

प्रेम के नए आयामों को उभारती नौ मुलाकातें

आधुनिक समाज में प्रेम को महज दो शब्दों में ही सीमित करके रख दिया गया है. पहली नजर के प्रेम के मायने अब देहयष्टि के इर्द-गिर्द केन्द्रित हो गए हैं. ऐसे संक्रमण भरे समय में जबकि प्रेम का तात्पर्य शारीरिक आकर्षण से लगाया जाने लगा है; प्रेम का सम्बन्ध शारीरिक संबंधों से माना जाने लगा है कथाकार बृज मोहन जी का उपन्यास नौ मुलाकातें सुखद अनुभूति कराता है. बृज मोहन जी विगत कई वर्षों से निरन्तर लेखन करते हुए पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं किन्तु उम्र के इस पड़ाव पर आकर जहाँ कि मनुष्य नाती-पोतों के साथ खेलने-कूदने में, उनको परियों की कहानियाँ सुनाने में व्यस्त हो जाता है, वे समाज को सार्थक कहानी सुना रहे हैं. उनके समीक्ष्य उपन्यास में कथा-नायक को पहली मुलाकात में ही कथा-नायिका से प्यार हो जाता है मगर उस प्यार में इतनी गम्भीरता दिखाई देती है कि उसमें मिलन की आतुरता होने के बाद भी शारीरिक मिलन की उत्कंठा नहीं होती है. प्रथम दृष्टया उपन्यास का शीर्षक संभवतः पाठकों को भ्रमित सा करे किन्तु जैसे ही पाठक उपन्यास में प्रवेश करता है वैसे ही पहली पंक्ति उसे चौंकाती सी है. मैंने मन ही मन जोड़ा, इति से मेरी यह नौंवी मुलाकात होगी. चालीस वर्ष की अवधि में नौंवी मुलाकात. चौंकना स्वाभाविक है, चालीस वर्ष की अवधि आर मुलाकातें मात्र नौ. कच्ची उम्र के प्यार से लेकर परिपक्व होने तक की यात्रा और मात्र नौ मुलाकातें. हो सकता है कि ये परिस्थिति आज के युवाओं के लिए हास्य का विषय बने किन्तु बृज मोहन जी ने जिस खूबसूरती से पूरे उपन्यास में नौ मुलाकातों को पिरोया है वह उन युवाओं के लिए सार्थक सन्देश हो सकता है, जिनके लिए प्रेम का तात्पर्य झाड़ियों के पीछे का मिलन है; शारीरिक आवेग को शांत करने का माध्यम है; परिवार के विरुद्ध विद्रोह है.

ऐसा नहीं है कि बृज मोहन जी के नायक-नायिका विद्रोह नहीं करते हैं. वे ऐसा करते भी हैं मगर अपने आपसे. उनके ऐसा करने में सामाजिकता का भाव है, पारिवारिक संस्कार हैं. चूँकि सम्पूर्ण उपन्यास में कथाकार ने प्यार का शीर्ष प्रदर्शित किया है जो तत्कालीन समाज की मनोदशा को स्पष्ट करते हुए अत्यंत शालीनता से आगे बढ़ता है. जहाँ प्रेम का निवेदन है, प्रेम पाने की उत्कंठा है, समाज से, परिवार से विद्रोह करने की भावना है मगर सबकुछ शालीन आवरण में कैद है. नायक-नायिका अपने प्रेम के ज़ाहिर हो जाने पर किंचित परेशान हैं मगर हताश नहीं. देखा जाये तो वे सहज भाव से आगे नहीं बढ़ते हैं वरन उनके हालात स्वतः आगे बढ़ने में उनकी मदद करते हैं. यही कारण है कि कथाकार के नायक-नायिका कहीं भटकते नहीं हैं. कहीं भी वे प्रेम शब्द को मलिन नहीं होने देते हैं.

कथाकार ने मात्र नौ मुलाकातों में प्रेम-कहानी को सीमित करके प्रेम की गहराई को प्रदर्शित न किया हो, ऐसा नहीं है. वे बहुत ही सहज भाव से प्रत्येक मुलाकात में प्यार को और ऊँचा उठाते जाते हैं. गतिशीलता के साथ आगे बढ़ती मुलाकातें नायक के विवाह के साथ विराम सा लेती दिखती हैं. ऐसे में एक बहुत लम्बी अवधि के बाद नायिका का फोन आना, नायक से स्टेशन पर मिलने का आग्रह, उन दोनों का साथ-साथ घूमना पाठकों को आश्चर्यचकित कर सकता है. उनके मन में तरह-तरह के ख्याल पैदा कर सकता है. प्रेम के जिस आधुनिक बिंदु तक कथाकार नहीं जा सके थे, बहुतेरे पाठक उस बिंदु तक पहुँचने का अनुमान लगाने लगते होंगे मगर ऐसा कुछ नहीं होता है. विगत आठ मुलाकातों का स्नेहिल और पावन प्रेम अपनी पावनता को नौवीं मुलाकात में भी बनाये रखता है. शबनमी एहसास के साथ-साथ आगे बढ़ते हुए जब परिपक्व नायिका माँ रूप में, एक जिम्मेवार नायक पिता के सामने एक प्रस्ताव रखती है तो पहली मुलाकात से लेकर नौवीं मुलाकात तक का सम्पूर्ण सफ़र पाठकों की आँखों के सामने एक बार फिर घूम जाता है. प्यार का ऐसा उत्कर्ष विरले ही देखने को मिलता है.

निश्चित ही आज के समय में ऐसे प्रेम की कल्पना करना बेमानी सा लगता है. ऐसे समय में जबकि सबकुछ स्वार्थमय होता जा रहा है तब बृज मोहन जी की नौ मुलाकातें प्रेमपरक कहानियों के लिए नई आशा का संचार करती हैं. उन नवोन्मेषी कलमकारों और पाठकों के लिए एक भावनात्मक मंच उपलब्ध कराती हैं जो प्रेम को मात्र मनोरंजन का, दैहिक आकर्षण का, यौन संतुष्टि का माध्यम मानते आ रहे हैं. नौ मुलाकातें न सिर्फ नायक-नायिका रिश्तों की गरिमा का बखान करती है वरन पाठकों के मन को भी झंकृत करती हुई नए आयाम विकसित करती है. मूल्यहीन, सरोकारविहीन होते जा रहे आज के समय में बृज मोहन जी की कृति स्वागतयोग्य है, साधुवाद की पात्र है.

समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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कृति : नौ मुलाकातें (उपन्यास)
लेखक : बृज मोहन
प्रकाशक : एपीएन पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली-59
संस्करण : प्रथम, 2016

ISBN : 978-93-85296-42-

बुधवार, 19 अक्तूबर 2016

ग्रामीण जीवनशैली, राजनीति का ताना-बाना

ऐसे समय में जबकि महानगरों की बेलौस जिंदगी, उन्मुक्त प्रेम-संबंध, सेक्स, देह केन्द्रित साहित्यिक कृतियों की रचना अधिकाधिक हो रही हो तब ग्रामीण अंचल को कथावस्तु का केंद्र बनाना जीवटता का कार्य कहा जायेगा. ऐसी जीवटता का काम लखनलाल पाल ने अपने उपन्यास बाड़ा के माध्यम से किया है. इसके साथ-साथ उन्होंने भाषा सम्बन्धी जोखिम भी उठाया है. गाँव की कथा कहते हुए वे बुन्देली भाषा, बोली के शब्दों का भरपूर प्रयोग करने से नहीं चूके हैं. कहानी के पात्रों का वार्तालाप उन्हीं की बोली, उन्हीं के अंदाज में होता है. वर्तमान दौर में जबकि हिन्दीभाषी लेखक भी हिन्दी के साथ-साथ हिंगलिश जैसी मिश्रित भाषा-बोली को जबरिया, खुलेआम ठूँसने में लगे हैं तब लखनलाल विशुद्ध ग्रामीण अंचल की कथा को विशुद्ध बुन्देली अंदाज में प्रस्तुत करने का कार्य करते हैं.

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में आज भी जाति, धर्म, राजनीति, आपसी मतभेद, गुपचुप साजिश करना आदि उपस्थित हैं. बाड़ा का ताना-बाना भी गाँव के इसी चरित्र के इर्द-गिर्द घूमता हुआ आगे बढ़ता है. उपन्यासकार ने बड़ी ही निष्पक्षता के साथ पात्रों को गढ़ते हुए ग्रामीण अंचल की आंतरिक व्यवस्था को सामने रखा है. विजातीय विवाह किये जाने के परिणामस्वरूप ग्रामीण व्यवस्था में कायम आंतरिक पारिवारिक, जातिगत व्यवस्था को तोड़ना या फिर उसके साथ सामंजस्य बनाते हुए संबंधों का, रिश्ते-नातों का निर्वहन करने की दुष्कर स्थिति को उपन्यास के पात्र जीते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी वैवाहिक समारोहों में, मांगलिक कार्यों में, संस्कारों आदि में जहाँ एक तरफ समन्वय, सहयोग की भावना अपने चरम पर दिखाई देती है वहीं दूसरी तरफ एकदूसरे को नीचा दिखाने की कुत्सित नीतियाँ भी बनती रहती हैं. रामकेश के चचेरे भाई द्वारा विजातीय विवाह करने के पश्चात् उठा विवाद, फिर जातिगत बहिष्कार के कारण जातिगत खेमेबंदी ने गाँव की मानसिकता को भली-भांति उकेरा है. इसी विवाद के बीच चाची का बाड़ा खरीदने को लेकर उठा मसला जातिगत वैमनष्यता को बढ़ाता है. अपने-अपने खेमों को बढ़ाने की नीति, अपने-अपने तरफ के लोगों को किसी न किसी रूप में अपने में ही शामिल बनाये रखने की जुगत के बीच दोनों पक्षों की हार-जीत होती रहती है.

रामकेश और भदोले दाऊ की जातिगत हनक स्थापित करने, अपना-अपना वर्चस्व बनाये रखने की जद्दोजहद करते हुए नए-नए हथकंडे अपनाते रहते हैं. हालाँकि बाड़ा खरीदने, उससे सम्बंधित लोगों के आपसी विवाद के बाद लम्बे समय तक बाड़ा गाँव की अन्य गतिविधियों के केंद्र से गायब ही रहता है तथापि अंत में वह पुनः कुल्हाड़ी लहराने के साथ सामने आ खड़ा होता है. ये लेखक का ग्रामीण अंचल से सम्बंधित होने का स्पष्ट परिचायक है कि आज भी गाँव के भीतर किसी विवाद का अंत नहीं होता है वरन देशकाल, परिस्थिति के अनुसार वह अपना रूप पुनः दिखा देता है.

उपन्यासकार लखनलाल कतिपय बिन्दुओं को लेकर जहाँ सशक्तता के साथ उभरकर सामने आते हैं वहीं किंचित कमजोर से भी दिखे हैं. एक महिला पात्र गुन्दी अत्यंत सशक्तता से अपनी उपस्थिति दर्शाती है. अपनी सौतेली बेटी को प्रताड़ित किये जाने की रोज-रोज की घटनाओं के बाद गुन्दी द्वारा उसी की ससुराल में जाकर उसकी सास को जबरदस्त तरीके से हड़काना, उसकी मजबूरी का फायदा उठाकर मिसुर द्वारा रुपये उधार देने के समय किये गए उसके शारीरिक शोषण का बौद्धिक रूप से बदला लेना, आवास योजना के अंतर्गत बनते मकानों की अनियमितता के विरोध में गुन्दी का खड़ा हो जाना, पति के अत्यंत बीमार होने के कारण गाँव भर के पुरुषों की कामलोलुप नज़रों का पूरे साहस के साथ सामना करना उसकी जिजीविषा को, उसके आत्मबल को दर्शाता है. लेखक संभवतः गाँव की कहानी कहने में, बाड़ा और जातिगत विवाद की कथा कहने में ज्यादा निमग्न रहे और इसी कारण से गुन्दी के चरित्र को और मजबूत बनाने से चूक गए. संभव है कि उपन्यास की मूलकथा को प्रभावित होने से बचाने के लिए ऐसा किया गया हो. बावजूद इसके लेखक द्वारा स्त्री सशक्तिकरण की एक नवीन परिभाषा का निर्माण किया जा सकता था.


ग्रामीण अंचल से परिचित पाठकों को इसे पढ़ने में अवश्य ही आनंद महसूस होगा क्योंकि बाड़ा की कथा कहीं न कहीं उन्हें अपने आसपास की कहानी प्रतीत होगी. इसी तरह ग्रामीण अंचल से अपरिचित पाठकों के लिए संभव है कि बाड़ा उपन्यास बोझिल अथवा नीरस लगे किन्तु यदि वे ग्रामीण अंचल को नजदीक से देखना-महसूस करना चाहते हैं तो उनके लिए इसे पढ़ना सुखद ही होगा. आधुनिकता के वशीभूत गाँवों के विलुप्त होते जाने के दौर में  ग्रामीण अंचल की जीवनशैली को बाड़ा के माध्यम से प्रस्तुत करना लेखक का सराहनीय एवं स्तुत्य प्रयास है. इस कृति का साहित्यजगत में भरपूर स्वागत होना ही चाहिए. 


समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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कृति : बाड़ा (उपन्यास)
लेखक : लखनलाल पाल
प्रकाशक : नीरज बुक सेंटर, दिल्ली-92
संस्करण : प्रथम, 2016
ISBN : 978-93-83625-23-9


रविवार, 27 मार्च 2016

स्नेह-विश्वास के पारम्परिक आधार पर लिव-इन का निर्माण



स्त्री-पुरुष सम्बन्ध किसी कृति के केंद्र में हों तो उसमें स्वतः ही अनेक विमर्श जन्म लेने लगते हैं और यदि उस कृति में लिव-इन रिलेशन जैसी अवधारणा हो तो संभावनाओं के कई-कई आयामों को तलाशा जाने लगता है. अपनी पहली औपन्यासिक कृति अँधेरे का मध्य बिंदु में वंदना गुप्ता ने ऐसे विषय को चुना जो पश्चिम सभ्यता-संस्कृति के कारण उन्मुक्त संबंधों, रिश्तों की वकालत करता है. पश्चिम आयातित इस सम्बन्ध ने भारतीय समाज में भी अपनी जड़ों को फैलाना शुरू कर दिया है, बावजूद इसके भारतीय समाज में इसे सहजता से स्वीकार नहीं किया जा रहा है. इसके पीछे लिव-इन रिलेशन में उन्मुक्त संबंधों का निर्माण, पश्चिमी यौन-संस्कृति का अनुपालन, गैर-जिम्मेवारी का भाव पैदा होना, रिश्तों के नामकरण से दूर महज शारीरिक सुखों का उपभोग करना आदि माना जा रहा है. यद्यपि पारिवारिक सहमति से निर्मित विवाह संस्था का स्वरूप वर्तमान युवा-वर्ग ने प्रेम-विवाह के द्वारा बहुत हद तक परिवर्तित किया है तथापि लिव-इन रिलेशन के द्वारा वे विवाह स्वरूप को खंडित कर पायेंगे, कहना मुश्किल प्रतीत होता है.

लिव-इन रिलेशन के प्रति समाज की सोच को जानते हुए भी वंदना जी ने अपनी पहली ही कृति में इस विषय पर कलम चलाई, इसे अवश्य ही प्रशंसनीय कहा जा सकता है. उपन्यास की कथा एक आदर्शात्मक स्थिति में ही गतिमान रहते हुए इस संबंध के सुखद अंत को परिभाषित करके ही रुकी. इसे संभवतः लेखिका का वो भय कहा जा सकता है जो उनकी स्वीकारोक्ति लिव-इन संबंधों की घोर विरोधी होते हुए भी जाने क्यों कलम ने यही विषय चुना. शायद यही मेरी सबसे बड़ी परीक्षा थी, जिन संबंधों को मैं कभी स्वीकार नहीं कर सकती उसी पर कलम चलाई जाए जो आसान कार्य नहीं था. में परिलक्षित होता है. कथा नायक रवि और कथा नायिका शीना के संबंधों का, रिश्तों का निरंतर सुखमय रूप से चलते रहना, उनके आपसी स्नेह, विश्वास, समन्वय, सहयोग का बने रहना किसी अन्य दूसरे लिव-इन रिलेशन रिलेशन की सफलता की गारंटी नहीं माना जा सकता है. जिस विश्वास, रिश्ते की गरिमा, अपनेपन, सहयोग की भावना का विकास इन दोनों के अनाम रिश्ते में दिखाया गया है, वो किसी भी सम्बन्ध की सफलता होते हैं. संभवतः लेखिका के मन-मष्तिष्क में खुद के इस सम्बन्ध के विरोधी होने का प्रतिबिम्ब बना हुआ था और इसी कारण से जाने-अनजाने वे लिव-इन रिलेशन की कमियों, दोषों को प्रदर्शित करने से बचती रहीं हैं. एकाधिक जगहों पर जहाँ भी ऐसा अवसर आया वहाँ अपनी मौलिकता से लेखिका ने उन्हें उभरने का अवसर नहीं दिया. ऐसे अवसरों के अलावा उपन्यास की कथा में अन्य दूसरे वैवाहिक संबंधों को कटुता, अहंकार, झगड़े, अविश्वास से भरे दिखाये जाने के पीछे लिव-इन रिलेशन को सफलता और वैवाहिक संबंधों को असफलता की तरफ ले जाने वाला समझ आता है. सदियों से चली आ रही विवाह संस्था में समय के साथ कई-कई विसंगतियाँ देखने को अवश्य मिली हैं किन्तु इसके बाद भी न केवल भारतीय समाज में वरन विदेशी समाज में भी वैवाहिक संबंधों को सहज मान्यता प्राप्त है. ऐसे समाजों में बहुतायत दंपत्ति ऐसे हैं जो ठीक उसी तरह का जीवन-निर्वहन करते हुए अनुकरणीय बने हैं जैसे कि रवि और शीना बने.

कथा के बीच वंदना जी ने एकाधिक अवसरों पर जानकरी देने का अनुकरणीय कार्य किया है. भले ही कई पाठकों को कहानी में मध्य में समाजोपयोगी तथ्यों का आना बोझिल अथवा अनुपयोगी जान पड़े किन्तु समालोचना की दृष्टि से इसमें और विस्तार की सम्भावना दिखती है. रवि शीना के संबंधों के आरम्भ में परिवार नियोजन की चर्चा, शीना के एचआईवी संक्रमित हो जाने पर चिकित्सकीय परामर्श, आदिवासी परम्परा का उल्लेख, कतिपय असफल लिव-इन संबंधों की चर्चा आदि को इस रूप में देखा जा सकता है. इसके अलावा वंदना जी की लेखनी की प्रशंसा इस रूप में भी की जानी चाहिए कि लिव-इन रिलेशन जैसा विषय चुनने के बाद भी वे रवि शीना के संबंधों का अत्यंत शालीनता के साथ उत्तरोत्तर विकास करती रही हैं. उनके पास इन संबंधों के नाम पर उन्मुक्तता, शारीरिक संसर्ग, मौज-मस्ती आदि के प्रस्तुतीकरण का विस्तृत कैनवास था किन्तु इसके उलट उनकी संतुलित लेखनी का परिचय मिला है. परंपरागत भारतीय समाज इन संबंधों को किस रूप में स्वीकारेगा, आधुनिकता में रचा-बसा युवा-वर्ग इसका विस्तार किस तरह करेगा, जिम्मेवारी से मुक्त इस सम्बन्ध में जिम्मेवारी का कितना भाव जागृत होगा ये तो भविष्य के गर्भ में छिपा है. वर्तमान में जिस तरह से विवाह संस्था में विसंगतियाँ देखने को मिल रही हैं, कुछ हद तक ऐसा ही लिव-इन रिलेशन में भी हो रहा है. यदि इन संबंधों में सब कुछ सामान्य अथवा अनुकरणीय होता तो लिव-इन संबंधों के बहुतायत मामलों में पुलिसिया कार्यवाही न हो रही होती. 

भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, उसे भविष्य पर छोड़ते हुए वंदना जी की कलम की, उनके विषय चयन की, भाषा की सरलता की, कथ्य की सहजता की, कथा गतिशीलता की, शाब्दिक चयन की, प्रस्तुतीकरण की सराहना करनी ही पड़ेगी. कृति की सफलता इसी में है कि या तो वो समुचित, सकारात्मक समाधान प्रस्तुत करे अथवा संभावनाओं के, विमर्श के नए द्वार खोले. अंत में लालित्य जी के अनुसार सबको पसंद आने वाले वाक्य तुम्हें फोल्ड कर के  अपनी पॉकेट में रख लूँ जहाँ-जहाँ जाऊँ वहाँ-वहाँ तुम मेरे साथ हो. को रवि शीना संबंधों के सापेक्ष प्रेमपरक कहा जा सकता है, इसकी प्रेम तासीर में मदहोश हुआ जा सकता है. इसके ठीक उलट यदि इसी वाक्य को स्त्री-विमर्श के, पति-पत्नी के संबंधों के नजरिये से देखा जाये तो स्त्री के प्रति गुलाम मानसिकता को, पुरुष द्वारा उसे अपनी जेब में रखे रहने को परिलक्षित करने लगता है. सहमतिपूर्ण वैवाहिक सम्बन्ध, प्रेम-विवाह, लिव-इन रिलेशन आदि कुछ इसी तरह के नजरिये को समेटे समाज में विचरण कर रहे हैं, जो आपसी प्रेम, स्नेह, सहयोग, समन्वय, विश्वास के आधार पर सफल, असफल सिद्ध हो रहे हैं.

समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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कृति : अँधेरे का मध्य बिंदु (उपन्यास)
लेखिका : वन्दना गुप्ता
प्रकाशक : एपीएन पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली
संस्करण : प्रथम, 2016
ISBN : 978-93-85296-25-3
 

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

देहरी के अक्षांश पर सतत सक्रिय स्त्री


          ‘मुट्ठी भर सपनों/और अपरिचित अपनों के बीच/देहरी के पहले पायदान से आरम्भ होती है/गृहणी के जीवन की/अनवरत यात्रा’ महज यात्रा नहीं होती वरन अनेकानेक संसारों को रचते-सँवारते हुए उन्हें शिखर पर पहुँचाने का आख्यान होती है. देहरी के अक्षांश पर खड़े होकर एक स्त्री भले ही ‘स्त्रीत्व और अस्तित्व’ को लेकर अपने आप से ‘एक प्रश्न’ करे ‘कि कितनी मैं बची हूँ मुझमें’, भले ही अपने आपको निरुत्तर समझे, अपने आपको ‘अनुबंधित परिचारिका सी’ मानते हुए किसी वीतरागी की तरह हर बार अनाचार सह जाती हो किन्तु सत्यता यही है वही ‘स्त्री हर रूप में आलोकित/करती है आँगन को/सजाती है दीपमालाएँ/बिखेर देती है प्रकाश/छत-मुंडेरों पर/और दमक उठता है/सबका जीवन.’ डॉ० मोनिका शर्मा अपने कविता-संग्रह ‘देहरी के अक्षांश पर’ के द्वारा स्त्री के विविध पहलुओं को उभारती हुई उन्हें कविता रूप में प्रदर्शित करती हैं. आलोचना की दृष्टि से संग्रह की रचनाओं को कविता कहना उन रचनाओं के मर्म को, भाव-बोध को कम करना ही होगा, उनके भीतर रची-बसी एक स्त्री की अंतर्वेदना, उसकी संवेदना, उसकी विलक्षणता को नकारना सा होगा. मोनिका शर्मा का ये कहना कि “कुछ देखा जिया सा शब्दों में ढालना हो तो कविताएँ सोच समझकर नहीं लिखी जातीं. मन को छूने और ह्रदय को उद्वेलित करने वाला हर भाव स्वतः शब्दों में बंधकर कविता का स्वरूप ले लेता है.” स्पष्ट करता है कि उनकी रचनाएँ महज कविता नहीं बल्कि एक स्त्री के जीवन के विविध रंग-रूप का भावनात्मक चिंतन है. 

          गृहणी की अनवरत यात्रा से आरम्भ उनका कविता-संग्रह शिखर के अकेलेपन तक जाता है गृहणी तो है ही बेटी भी है, माँ भी है, परिवार भी है और सबसे बड़ी बात कि ‘स्त्रियों का संसार’ भी है, ‘स्त्री की छवि’ भी है, ‘स्त्री का अस्तित्व’ भी है, स्त्री का स्त्री होना भी है. इस होने में, समझने में, अनुभूत करने में उनकी देखी हुई, एहसास की हुई, जी हुई स्त्री सिर्फ शोषित नहीं है, सिर्फ प्रताड़ित नहीं है; वह सिर्फ ‘पीड़ा’, ‘नैराश्य’, ‘संबंधों का दर्द’ ही नहीं सह रही है वरन एक ‘असाधारण भूमिका’ में है. इस भूमिका में वो ‘सूत्रधार’ है और सगर्व उद्घोष सा करती है ‘सूत्रधार हूँ और सहायिका भी/.... सहेज कर रखती हूँ अपनी ऊर्जा/मुश्किलों से रूबरू रहने का आदम विश्वास/ताकि गतिशील रहे सभी का जीवन.’ उनकी स्त्री महज उद्घोष ही नहीं करती वरन ‘स्त्री हूँ मैं/मेरे शब्दों में दमकता है अंतर्मन का ओज/मुट्ठियों में पकड़ रखी है/आत्मविश्वास की रस्सी/मन चेतना से लबालब है/और तन है दृढ़ता से पूरित/मुझे शिखर पर नहीं जाना/मुझे तो विस्तार पाना है.’ का पथ प्रशस्त करती हुई अपने स्त्री होने पर गर्व करती है. 

          मोनिका शर्मा की स्त्री चहारदीवारी के भीतर की दुनिया में रंग भरने के लिए, अपने घर-आँगन को सजाने के लिए तत्पर दिखती है; अपने आपको गृहणी की भूमिका में देखकर अपनी उपलब्धियों को संदूक में दफ़न सा कर देने की अदम्य क्षमता रखती है; घर-परिवार की धुरी होते हुए भी खुद को अधूरी सा अनुभव करती है इसके बाद भी वो नैराश्य के गहन अन्धकार में विलुप्त नहीं हो जाती है. वो जागृत अवस्था में दिखती है, कभी अपने लिए, कभी अपने अंश के लिए. जिम्मेवारियों, अंतहीन दायित्वों के बोध से परिपूर होने के बाद भी वो स्त्री ‘संबंधों के सवाल’ उठाती है. सम-विषम होती जा रही भावनाओं के बीच भी वो भावनात्मकता को जिन्दा रखते हुए वो स्त्री अपनी भावी पीढ़ी को जगाने का काम भी पूरी दृढ़ता से करती है. यद्यपि ‘आखिर क्यों जन्में बेटियां?’ के द्वारा मोनिका शर्मा ने न केवल स्त्री मन की वरन समाज के प्रत्येक संवेदित दिल की भावना को सामने रखा है साथ ही ‘क्यों बढ़ाये कोई स्त्री तुम्हारी वंश-बेल?/जब तुम खेलते हो ये तिरस्करणीय खेल/शक्ति-स्वरूपा कहते-कहते/रक्त-रंजित करते हो उनका अस्तित्व/और अमानुष बन/अनावृत करते हो उनकी देह.’ जैसे कठोर वचनों के द्वारा पुरुष-प्रधान समाज पर, अपनी वंश-बेल वृद्धि के लिए सिर्फ पुत्र-जन्म को लालायित समाज पर भी प्रहार भी कहती हैं. वे ‘क्यों अभिव्यक्ति की/संभावनाओं से परे/केवल सुनना और हर मत को/निर्विरोध स्वीकार लेना सीख लेती हैं’ के द्वारा यदि स्त्री बेटियों के तर्क, उनकी ऊर्जा को प्रश्नचिन्ह के घेरे में खड़ा करके उनमें आत्मबोध जगाना चाहती है तो ‘कुछ बनो ना बनो/निर्भीक बनो/स्वयं को हरगिज नहीं खोना’ के द्वारा बेटियों को निडरता सिखाती हैं.

          ‘देहरी के अक्षांश पर’ की रचनाएँ स्त्री के रोजमर्रा की भूमिका का चित्रण करती हैं. इन रचनाओं को घर-बाहर कई-कई भूमिकाओं में कार्यरत दिखती स्त्री, जिम्मेवारी से परिपूर्ण स्त्री, दायित्व-बोध में उलझी-लिपटी स्त्री की सहजता से असहजता, सामान्यता से असामान्यता, समानता से विषमता, कोमलता से कठोरता, सुख से नैराश्य आदि-आदि का शब्द-चित्र कहा जा सकता है. सामान्य स्त्री की विभिन्न भूमिकाओं, उसकी भावनाओं, उसके यथार्थ को सामने लाने के लिए कवियत्री ने कोमलकांत शब्दों के द्वारा ही रचनाओं को पद्य-रूप प्रदान किया है. सामान्य, सहज, रोजमर्रा के शब्दों के कारण पाठक सामान्य रूप से, सहजता से कविताओं के साथ तादाम्य बैठा लेता है. ये लेखिका की लेखनी और वैचारिकता की सफलता ही कही जाएगी कि सामान्य स्त्री के जीवन का आख्यान अत्यंत सरलता, सहजता से दिल तक अपनी पैठ बना लेता है और फिर उसी के रास्ते पाठकों के मन-मष्तिष्क को उद्वेलित भी करता है.

समीक्षक – डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर


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कृति : देहरी के अक्षांश पर  (कविता संग्रह)

लेखिका : डॉ० मोनिका शर्मा

प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर

संस्करण : प्रथम, अगस्त 2015 

ISBN : 978-93-84979-57-7

शनिवार, 31 अक्तूबर 2015

चुभती हैं कुछ किरिचें 'काँच के शामियाने' की

“आंचलिक बोली के चुटीलेपन के साथ रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं के ताने-बाने से बुनी इस कथा में हर लड़की कहीं-न-कहीं अपना चेहरा देख पाती है. यही इस उपन्यास की सार्थकता है.” सुधा अरोड़ा द्वारा रश्मि रविजा के पहले उपन्यास ‘काँच के शामियाने’ भूमिका की मानिंद लिखी ये पंक्तियाँ पढ़ने के बाद आँखें समूचे उपन्यास में रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं के ताने-बाने को तलाशती हैं. छोटी-छोटी घटनाओं का ताना-बाना मिलता है मगर इस कदर उलझा कि महज एक परिवार या फिर कहें कि पति-पत्नी के मध्य ही सिमटा नजर आता है. एक समीक्षक की दृष्टि से मेरा मानना है कि कम से कम ऐसे ताने-बाने में कोई भी लड़की अपना चेहरा नहीं देख पाती होगी. रश्मि रविजा का ये पहला उपन्यास है और जिस तरह की उनकी लेखनी, उनके विषय, उन विषयों की गंभीरता उनके ब्लॉग अथवा सोशल मीडिया की अन्य दूसरी सामग्री में देखने को मिलती है वैसी कसावट, वैसी गंभीरता इस उपन्यास में देखने को नहीं मिलती है.

यदि इस उपन्यास को एक ऐसी स्त्री की नजर से देखा जाये जो अपने पति, ससुराल से प्रताड़ित हो; अपना अस्तित्व बचाए-बनाये रखने को संघर्षरत हो; लगातार विषम परिस्थितियों के बाद भी वो न सिर्फ अपना विकास करती है वरन अपने बच्चों का भी विकास करती है तो निश्चित ही ये उपन्यास ऐसे ताने-बाने का निर्माण करता है. एक युवती का विवाह, विवाह पूर्व ही पति के स्वभाव को लेकर आशंका, उस आशंका का सही निकलना, पति के साथ-साथ ससुराल वालों का नित्य प्रति प्रताड़ना देना, युवती के परिजनों द्वारा ससुरालीजनों की शिकायत करना, परिस्थितियों के वशीभूत उस लड़की का वापस ससुराल आना, ससुरालियों का स्वार्थवश तात्कालिक रूप से स्वभाव परिवर्तन होना, इन्हीं विषम परिस्थितियों में तीन-तीन बच्चों का जन्म होना, मार डालने तक के हालात बनने के साथ-साथ तीनों बच्चों सहित आत्महत्या करने जैसी स्थिति का उत्पन्न हो जाना और अंततः उस युवती का अपने तीनों बच्चों सहित पति का घर हमेशा-हमेशा के लिए छोड़कर आत्मनिर्भर बनने की कवायद करना, नया संघर्ष छेड़ना अवश्य ही कृति को कथा-प्रवाह देता है. इसके बाद भी इस कथा-प्रवाह में कई-कई अवरोध औपन्यासिक विकास में बाधक बनते हैं.  

ये किसी भी रूप में समझ से परे है कि किसी भी कालखंड में, देशकाल में कोई युवक (राजीव) महज इस कारण से किसी युवती (जया) से विवाह करेगा क्योंकि जया ने राजीव के प्रेम-निवेदन को ठुकरा दिया था. इसे उपन्यास विकास में बाधक इस कारण से कहा जा सकता है क्योंकि पूरे उपन्यास में राजीव के चरित्र का विस्तार नहीं किया गया है. कहीं भी लेखिका द्वारा उसको दुश्चरित्र नहीं दिखाया गया है. यदि लेखिका द्वारा राजीव के चरित्र को कुछ इस तरह से उभारा गया होता कि उसके कई-कई लड़कियों से सम्बन्ध हैं, उसने कहीं और विवाह कर रखा है तब जया से बदला लेने का मंतव्य कुछ हद तक स्पष्ट हो सकता था. इसके अलावा भी कुछ अन्य परिस्थितियों का निर्माण लेखिका द्वारा बदला लेने के कारक के सम्बन्ध में किया जा सकता था. इसके अलावा किसी पिता का अपनी ही संतानों से इस हद तक नफरत करने के कारण भी लेखिका द्वारा सामने नहीं रखे गए हैं. राजीव अथवा उसके परिवार वालों द्वारा जया को दुश्चरित्र का आरोप लगाते भी कहीं नहीं दिखाया गया है. ऐसे में राजीव किस कारण से अपने तीनों बच्चों से भयंकर नफरत करता है, समझना कठिन होता है. उसकी नफरत इस कदर उग्र रूप धारण करती है कि अपनी ही बेटी के बारे में सोचना ‘बच गई ये. हम तो इसके ऊपर जाने की खबर का इंतज़ार कर रहे थे और सोच रहे थे, छुट्टी लेना पड़ेगा.’ और एक दूसरी बेटी को फेंकने की घटना राजीव की नफरत की भावना को स्पष्ट नहीं करती हैं. यदि लेखिका द्वारा घर से बाहर के चंद दृश्यों को समाहित किया गया होता जिसके द्वारा कथा-प्रवाह का वातावरण निर्मित होता तो संभवतः कुछ स्पष्टता परिलक्षित होती.  


रश्मि जी की वर्तमान कृति संभवतः उनकी आरंभिक वय में समाज के देखे-सुने अनुभवों का प्रस्तुतीकरण है क्योंकि कालखण्ड, वातावरण वर्तमान से बहुत पीछे का एहसास कराता है. यदि उपन्यास के कालखण्ड (जिसके बारे में लेखिका ने कहीं स्पष्ट रूप से नहीं लिखा, महज घटनाओं, कथा के सहारे स्पष्ट होता है) को देखा जाये तो एक ऐसे समय में जबकि फोन कॉलोनी भर में किसी एक घर में हो, बैंक में पाँच हजार रुपये महीने का वेतन भी बहुत हो तब किसी शोषित स्त्री का अपने तीन-तीन बच्चों सहित पति का घर छोड़कर चले आना, छोटे-छोटे कार्यों के द्वारा स्व-विकास करना, अदालती कार्यवाही का सामना करना, दुष्ट पति के प्रत्येक प्रताड़ित करने वाले क़दमों का साहस के साथ सामना करना यकीनन किसी भी महिला के सशक्त होने को प्रदर्शित करते हैं. किसी भी कृति की सफलता-असफलता, उसकी कथा की स्वीकार्यता-अस्वीकार्यता किसी समीक्षा के बजाय पाठकों पर निर्भर करती है. जहाँ रश्मि रविजा का पहला उपन्यास शोषित स्त्री को हताश न होने देने, संघर्षों का मुकाबला करने, विपरीत परिस्थितियों में धैर्य न खोकर स्व-विकास करने का सन्देश देता है वहीं वर्तमान के स्त्री-विमर्श को भी राह दिखाता है. यदि स्त्री को प्रताड़ित करने में पुरुष (या कहें कि उसका पति) आगे है तो कहीं न कहीं महिला (सास, ननद आदि के रूप में) भी शामिल है. यदि स्त्री स्व-विकास करती है तो भी कहीं न कहीं उसके पीछे पुरुष (भाई, जीजा आदि) सहित महिला (माँ, दीदी आदि) भी शामिल होते हैं. समाज महज बुरे लोगों से नहीं भरा है और न ही सभी जगह अच्छे लोग मिलते हैं. प्रत्येक स्त्री ही शोषित नहीं है और न ही प्रत्येक पुरुष शोषण करने में लगा हुआ है. ऐसे में यदि ‘काँच के शामियाने’ की हलकी-फुलकी किरिचें नजरअंदाज कर दी जाएँ तो कथा अपना सन्देश देने में कुछ हद तक सफल अवश्य होती है. पाठकों को रश्मि जी से अपेक्षा रहेगी कि वे जल्द ही इसके संशोधित संस्करण से तमाम किरिचों को दूर कर कृति को चरम पर ले जाएँगी. 

समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर 






कृति : काँच के शामियाने (उपन्यास)
लेखिका : रश्मि रविजा
प्रकाशक : हिन्द युग्म, नई दिल्ली
ISBN : 978-93-84419-19-6
संस्करण : पहला (2015)