शनिवार, 28 जून 2014

बम संकर टन गनेस के बहाने गाँव की सैर

 
उत्तरी बिहार के तरियानी छपरा से दिल्ली को अपना कर्मक्षेत्र बनाने निकले उत्साही युवा राकेश कुमार सिंह यहीं के होकर नहीं रहे. देश को मीडिया के द्वारा विविध ज्वलंत विषयों पर नापने की चाह ने उन्हें बंधन से मुक्त रखा और उनके फक्कडपन से निकली कृति ‘बम संकर टन गनेस’ भले ही उनके गाँव की कहानी कहती है किन्तु पाठकों को अपने गाँव की कहानी सी लग सकती है. समूची कहानी तरियानी छपरा की है, वहाँ के लोगों की है, वहाँ की संस्कृति की है, वहाँ की सामूहिकता की है, वहाँ के भेदभाव की है, वहाँ की मिठास की है, वहाँ की कड़वाहट की है... इसके बाद भी अपने सी लगती है. क्षेत्रीय भाषा-बोली के साथ-साथ देशज शब्दों की उपस्थिति वातावरण को जीवंत बनाती है, हाँ, भोजपुरी, मैथिली भाषा से अनजान लोगों के लिए सन्दर्भ लेना कठिनाई पैदा कर सकता है. इस सम्बन्ध में राकेश कुमार सिंह की साफगोई ‘जो है सो कि...’ में दिल को छू जाती है कि ‘हमारी वैसे भी समूचे भारत पर दावेदारी होती है, यहाँ की बहुरंगी संस्कृति एवं परम्पराओं के साथ अपना एका होने का सबूत हम बार-बार पेश करते रहते हैं. अपने सामने थोड़ी अलग ढंग से लिखी हिन्दी ही तो है.’ यही साफगोई उनके द्वारा प्रस्तुत विवरण में बार-बार देखने को मिलती है. 
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‘अनुपिया’ से आरम्भ हुए ‘बम संकर टन गनेस’ का सफ़र ‘हिंसा युग’ पर समाप्त होता है किन्तु कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि कोई भी पात्र, कोई भी कथा पाठक से अछूती है. अनुपिया जैसी एक-दो नहीं कई-कई महिलाएँ हमारे आसपास मिल जाती हैं, जो न पता कबसे परिवार का संरक्षण, पोषण कर रही होती हैं और उन्हें खुद के इतिहास-भूगोल की जानकारी नहीं होती है. राकेश कुमार सिंह के साथ जीवन्तता बनाये पात्र उन पाठकों के साथ भी अवश्य ही एकाकार हो उठते हैं जो किसी न किसी रूप में आज भी गाँव से संपर्क बनाये हुए हैं अथवा गाँव से जुड़े रहे हैं. ‘बम संकर टन गनेस’ की यात्रा करते में बारी-बारी से मिलते जाते ‘पहले केमिस्ट’, ‘डाकपिन साहेब’, ‘धनबीर’, ‘सपाटू वाली दाई’ हमारे जाने-पहचाने से लगते हैं. 
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राकेश कुमार सिंह ने सहजता के साथ आज के उन्नत समाज में, जहाँ कि गाँव-गाँव तक मोबाइल की पहुँच हो गई है, मोबाइल के सिगनल पकड़ने सम्बन्धी जानकारी लोगों को हो गई है, खुलेआम शराबखोरी को आपसी संबंधों के बीच स्वीकार्यता मिल गई हो, गुलामी की प्रथा के समाप्त होने के बाद भी अप्रत्यक्ष रूप से गाँवों में आज भी पारिवारिक हज्जाम जैसी व्यवस्था कायम है, फिर भी जातिगत आधार पर भेदभाव बना हुआ है. आज भी शादी समारोहों में, पंगतों में, खाने-पीने के अवसरों पर, घर-आँगन में आवाजाही के सम्बन्ध में कड़े नियम-विधान गाँवों में दृष्टिगत होते हैं. प्रगतिशील लेखक को ये बातें असहज बनाती हैं तो ‘राजू भैया, रिवाज़ न ख़राब कीजिये गाँव का. इ दिल्ली थोड़े है!’ के द्वारा वास्तविकता का आभास भी करवाती हैं. कमोबेश सभी गाँवों में आज भी इसी तरह की स्थितियाँ देखने को मिलती हैं. जहाँ ‘पत्ता बुहारने वाली’ आज भी गाँव के कुछ नवोदित रईसजादों के द्वारा जोर-जबरदस्ती का शिकार होती हैं, कई सत्यनारायण आज भी असमय काल का शिकार बना दिए जाते हैं. 
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‘बम संकर टन गनेस’ मात्र तरियानी छपरा की कथा नहीं है, महज राकेश कुमार सिंह का अनुभव नहीं है हर उस देशवासी की आवाज़ है जो ग्रामीण परिवेश को मन-मष्तिष्क में बसाये हुए कहीं भी बसा हुआ है, कुछ भी कर रहा है. कथा का प्रवाह इस तरह से है कि राकेश कुमार सिंह गाँव की एक-एक गली को घुमाते हैं, गाँव ही नहीं बल्कि गाँव से बाहर और आसपास का चित्र इस तरह से खींचते हैं कि पाठक खुद को उसी जगह पर खड़ा हुआ पाता है. भाषागत विविधता कई जगहों पर इस प्रवाह को रोकती सी लगती है, विशेष रूप से जब दो स्थानीय लोगों का वार्तालाप हो रहा होता है, किन्तु उस समय तक पाठक इस तरह से साहचर्य बैठा चुका होता है कि उसे वार्तालाप को समझने में बहुत अधिक कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता है. हाँ, कई जगह पर लेखक स्वयं ही पाठकों के सामने भटकाव सा पैदा कर देता है. किसी भी सम्बंधित व्यक्ति, सम्बंधित घटनाक्रम के बारे में बताते-बताते लेखक द्वारा कई स्थानों पर अनावश्यक विस्तार कर दिया गया है. ये भी देखने में आया कि कई बार लेखक जिस घटना का जिक्र कर रहा होता है, विस्तार देने के कारण, आसपास के सम्बंधित बिन्दुओं के बारे में जानकारी देने के कारण से मूल घटना को अधूरा सा छोड़ देता है. दरअसल ये उस अनुभव का  अतिरेक है जिसे लेखक ने स्वयं देखा-सुना-सहा-अनुभव किया है. कथा-प्रवाह की भटकन लेखक द्वारा सायास नहीं है वरन पाठकों के सामने सब कुछ रख देने के उत्साह में स्वतः हो जाती है. लेकिन ये भटकन ऐसी नहीं है जो पाठकों को भटका दे, वह तो तरियानी छपरा में ही पाठकों को घुमाती है जो कभी सामुदायिक भवन तक ले जाती है; कभी स्कूल के दर्शन कर देती है; कभी बारात के पंडाल तक ले जाती है; कभी आम का स्वाद दिलवाने गाछी ले जाती है; कभी चापाकल से पानी पिलवाती है; कभी चमटोली, कभी धनुकटोली, कभी बाबा टोला, कभी मियां टोली, कभी बिचला पट्टी के भीतर ले जाकर उनकी स्थिति दिखाती है; इसी भटकाव में कहीं चनेसर बाबा मिलते हैं तो कहीं किशोरी बाबा मिल जाते हैं. 
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स्थानीय भाषा की ग्राह्य क्लिष्टता को, कथा प्रवाह से इतर स्वतः तरियानी छपरा की गलियों में भ्रमण की भटकन को, अपने आसपास के एक-एक व्यक्ति, एक-एक घटनाक्रम से परिचित करवाने के उत्साह में अनावश्यक कथा विस्तार को यदि नज़रंदाज़ कर दिया जाये तो राकेश कुमार सिंह की कृति ‘बम संकर टन गनेस’ सहेजने योग्य कृति है. कृति के सहेजने के पीछे का सबसे महत्त्वपूर्ण कारक इसका उस ग्रामीण परिवेश की चर्चा करना है, जिसे हम सब विस्मृत करते जा रहे हैं, साहित्य से दूर करते जा रहे हैं. ये कृति इस कारण भी सहेजने योग्य है कि ये पाठकों को अपने आसपास की कहानी कहती इस लग सकती है. इस कृति को इस कारण से भी सहेजा जाना चाहिए क्योंकि आने वाले समय में ये नई पीढ़ी को ग्रामीण परिवेश के बारे में, वहाँ के जीवन के बारे में, वहाँ के लोगों के बारे में, वहाँ के संस्कारों के बारे में, वहाँ के रीति-रिवाजों के बारे में, वहाँ के भेदभाव के बाद भी सहयोगात्मक व्यवहार के बारे में, वहाँ के आपसी साहचर्य के बारे में विस्तार से जानकारी दे सकती है. लेखक राकेश कुमार सिंह ‘बम संकर टन गनेस’ के लिए साधुवाद के पात्र हैं. 

1 टिप्पणी:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन हुनर की कीमत - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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