शनिवार, 31 अक्तूबर 2015

चुभती हैं कुछ किरिचें 'काँच के शामियाने' की

“आंचलिक बोली के चुटीलेपन के साथ रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं के ताने-बाने से बुनी इस कथा में हर लड़की कहीं-न-कहीं अपना चेहरा देख पाती है. यही इस उपन्यास की सार्थकता है.” सुधा अरोड़ा द्वारा रश्मि रविजा के पहले उपन्यास ‘काँच के शामियाने’ भूमिका की मानिंद लिखी ये पंक्तियाँ पढ़ने के बाद आँखें समूचे उपन्यास में रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं के ताने-बाने को तलाशती हैं. छोटी-छोटी घटनाओं का ताना-बाना मिलता है मगर इस कदर उलझा कि महज एक परिवार या फिर कहें कि पति-पत्नी के मध्य ही सिमटा नजर आता है. एक समीक्षक की दृष्टि से मेरा मानना है कि कम से कम ऐसे ताने-बाने में कोई भी लड़की अपना चेहरा नहीं देख पाती होगी. रश्मि रविजा का ये पहला उपन्यास है और जिस तरह की उनकी लेखनी, उनके विषय, उन विषयों की गंभीरता उनके ब्लॉग अथवा सोशल मीडिया की अन्य दूसरी सामग्री में देखने को मिलती है वैसी कसावट, वैसी गंभीरता इस उपन्यास में देखने को नहीं मिलती है.

यदि इस उपन्यास को एक ऐसी स्त्री की नजर से देखा जाये जो अपने पति, ससुराल से प्रताड़ित हो; अपना अस्तित्व बचाए-बनाये रखने को संघर्षरत हो; लगातार विषम परिस्थितियों के बाद भी वो न सिर्फ अपना विकास करती है वरन अपने बच्चों का भी विकास करती है तो निश्चित ही ये उपन्यास ऐसे ताने-बाने का निर्माण करता है. एक युवती का विवाह, विवाह पूर्व ही पति के स्वभाव को लेकर आशंका, उस आशंका का सही निकलना, पति के साथ-साथ ससुराल वालों का नित्य प्रति प्रताड़ना देना, युवती के परिजनों द्वारा ससुरालीजनों की शिकायत करना, परिस्थितियों के वशीभूत उस लड़की का वापस ससुराल आना, ससुरालियों का स्वार्थवश तात्कालिक रूप से स्वभाव परिवर्तन होना, इन्हीं विषम परिस्थितियों में तीन-तीन बच्चों का जन्म होना, मार डालने तक के हालात बनने के साथ-साथ तीनों बच्चों सहित आत्महत्या करने जैसी स्थिति का उत्पन्न हो जाना और अंततः उस युवती का अपने तीनों बच्चों सहित पति का घर हमेशा-हमेशा के लिए छोड़कर आत्मनिर्भर बनने की कवायद करना, नया संघर्ष छेड़ना अवश्य ही कृति को कथा-प्रवाह देता है. इसके बाद भी इस कथा-प्रवाह में कई-कई अवरोध औपन्यासिक विकास में बाधक बनते हैं.  

ये किसी भी रूप में समझ से परे है कि किसी भी कालखंड में, देशकाल में कोई युवक (राजीव) महज इस कारण से किसी युवती (जया) से विवाह करेगा क्योंकि जया ने राजीव के प्रेम-निवेदन को ठुकरा दिया था. इसे उपन्यास विकास में बाधक इस कारण से कहा जा सकता है क्योंकि पूरे उपन्यास में राजीव के चरित्र का विस्तार नहीं किया गया है. कहीं भी लेखिका द्वारा उसको दुश्चरित्र नहीं दिखाया गया है. यदि लेखिका द्वारा राजीव के चरित्र को कुछ इस तरह से उभारा गया होता कि उसके कई-कई लड़कियों से सम्बन्ध हैं, उसने कहीं और विवाह कर रखा है तब जया से बदला लेने का मंतव्य कुछ हद तक स्पष्ट हो सकता था. इसके अलावा भी कुछ अन्य परिस्थितियों का निर्माण लेखिका द्वारा बदला लेने के कारक के सम्बन्ध में किया जा सकता था. इसके अलावा किसी पिता का अपनी ही संतानों से इस हद तक नफरत करने के कारण भी लेखिका द्वारा सामने नहीं रखे गए हैं. राजीव अथवा उसके परिवार वालों द्वारा जया को दुश्चरित्र का आरोप लगाते भी कहीं नहीं दिखाया गया है. ऐसे में राजीव किस कारण से अपने तीनों बच्चों से भयंकर नफरत करता है, समझना कठिन होता है. उसकी नफरत इस कदर उग्र रूप धारण करती है कि अपनी ही बेटी के बारे में सोचना ‘बच गई ये. हम तो इसके ऊपर जाने की खबर का इंतज़ार कर रहे थे और सोच रहे थे, छुट्टी लेना पड़ेगा.’ और एक दूसरी बेटी को फेंकने की घटना राजीव की नफरत की भावना को स्पष्ट नहीं करती हैं. यदि लेखिका द्वारा घर से बाहर के चंद दृश्यों को समाहित किया गया होता जिसके द्वारा कथा-प्रवाह का वातावरण निर्मित होता तो संभवतः कुछ स्पष्टता परिलक्षित होती.  


रश्मि जी की वर्तमान कृति संभवतः उनकी आरंभिक वय में समाज के देखे-सुने अनुभवों का प्रस्तुतीकरण है क्योंकि कालखण्ड, वातावरण वर्तमान से बहुत पीछे का एहसास कराता है. यदि उपन्यास के कालखण्ड (जिसके बारे में लेखिका ने कहीं स्पष्ट रूप से नहीं लिखा, महज घटनाओं, कथा के सहारे स्पष्ट होता है) को देखा जाये तो एक ऐसे समय में जबकि फोन कॉलोनी भर में किसी एक घर में हो, बैंक में पाँच हजार रुपये महीने का वेतन भी बहुत हो तब किसी शोषित स्त्री का अपने तीन-तीन बच्चों सहित पति का घर छोड़कर चले आना, छोटे-छोटे कार्यों के द्वारा स्व-विकास करना, अदालती कार्यवाही का सामना करना, दुष्ट पति के प्रत्येक प्रताड़ित करने वाले क़दमों का साहस के साथ सामना करना यकीनन किसी भी महिला के सशक्त होने को प्रदर्शित करते हैं. किसी भी कृति की सफलता-असफलता, उसकी कथा की स्वीकार्यता-अस्वीकार्यता किसी समीक्षा के बजाय पाठकों पर निर्भर करती है. जहाँ रश्मि रविजा का पहला उपन्यास शोषित स्त्री को हताश न होने देने, संघर्षों का मुकाबला करने, विपरीत परिस्थितियों में धैर्य न खोकर स्व-विकास करने का सन्देश देता है वहीं वर्तमान के स्त्री-विमर्श को भी राह दिखाता है. यदि स्त्री को प्रताड़ित करने में पुरुष (या कहें कि उसका पति) आगे है तो कहीं न कहीं महिला (सास, ननद आदि के रूप में) भी शामिल है. यदि स्त्री स्व-विकास करती है तो भी कहीं न कहीं उसके पीछे पुरुष (भाई, जीजा आदि) सहित महिला (माँ, दीदी आदि) भी शामिल होते हैं. समाज महज बुरे लोगों से नहीं भरा है और न ही सभी जगह अच्छे लोग मिलते हैं. प्रत्येक स्त्री ही शोषित नहीं है और न ही प्रत्येक पुरुष शोषण करने में लगा हुआ है. ऐसे में यदि ‘काँच के शामियाने’ की हलकी-फुलकी किरिचें नजरअंदाज कर दी जाएँ तो कथा अपना सन्देश देने में कुछ हद तक सफल अवश्य होती है. पाठकों को रश्मि जी से अपेक्षा रहेगी कि वे जल्द ही इसके संशोधित संस्करण से तमाम किरिचों को दूर कर कृति को चरम पर ले जाएँगी. 

समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर 






कृति : काँच के शामियाने (उपन्यास)
लेखिका : रश्मि रविजा
प्रकाशक : हिन्द युग्म, नई दिल्ली
ISBN : 978-93-84419-19-6
संस्करण : पहला (2015)

3 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, डे लाईट सेविंग - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. कुमारेंद्र जी, विलम्ब से यहाँ आई, क्षमाप्रार्थी हूँ। पुस्तक समीक्षा के दौरान व्यक्त किये गए विचार, पूरी तरह समीक्षक की अपनी अनुभूति होती है। ये आपकी निजी राय है उपन्यास के बारे में। सुधा जी ने जो लिखा मुझे नAही लगता कि केवल तारीफ़ करने के लिए लिखा। वे जिस कलेवर की कथाकार हैं, उनसे ऐसी अपेक्षा की भी नहीं जा सकती। रही बात रोज़मर्रा के ताने बाने की तो मुझे अचरज है कि वे आपको नहीं दिखे!! जबकि उपन्यास की नींव ही इन तानों बानों पर रखी है। ऐसा आपको लगता है। किसी लड़की/महिला से पूछ के देखिये कि उसने किस जगह अपना अक्स जया में पाया। राजीव की जया से शादी की ज़िद पर आपको अचरज है, और मुझे आपके इस अचरज पर अचरज के साथ अफ़सोस भी है। लगता है भारतीय समाज के मध्यमवर्गीय परिवारों के बीच आपकी पैठ नहीं है। पुरुषों की मानसिकता कितनी और कैसी कैसी होती है,ये आप कैसे नहीं जानते!!! राजीव जैसे किसी लड़की के इंकार को अपना प्रेस्टीज पॉइंट बनाने वाले पता नही कितने पुरुषों को तो मैं खुद जानती हूँ। ससुराल में आये दिन जला देने की फरनाएं यूं ही नहीं हो जातीं। और बच्चे! कमाल है कुमारेन्द्र जी। हमारे देश में शादी के बाद
    बच्चे पहले होते हैं, प्रेम बाद में।
    कहानी का कालखंड तो स्वतः ही ज्ञात हो जाता है जब हम उस वक्त के माहौल का वर्णन पढ़ते हैं। लीगों की तनख्वाह के बारे में भी इसीलिए लिखा गया। किसी भी उपन्यास में काल विशेष की सूचना देना अनिवार्य नहीं होता। उपन्यास आज की पृष्ठभूमि में लिखा गया होता तो ज्या ने इतनी ज़िल्लत सही ही नहीं होती।
    उम्मीद है, मेरी बात को रश्मि की पैरवी नहीं समझेंगे। पुस्तक मैंने भी पढ़ी है सो अपनी राय दे पा रही हूँ।

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  3. सेंगर जी राजीव का नेचर ही ऐसा है उसके लिए उसका दुश्चरित्र होना जरूरी नहीं दूसरे वो एक जिद्दी किरदार है जिसे जो चाहिए तो बस चाहिए , उसके लिए इंसान इंसान नहीं खिलौना है और जया भी खिलौना ही थी , उसने एक इनकार क्या किया कि राजीव ने उसे प्रेस्टीज इशु बना लिया और उससे शादी करके उससे बदला भी ले लिया फिर वो चाहता है कि उसे इतना परेशान किया जाए कि वो खुद घर छोड़ कर चली जाए ताकि वो फिर से शादी कर सके जहाँ से उसे दान दहेज़ मिल सके ..........शायद ये पहलू आपकी निगाह में नहीं आया वरना ये सवाल आप नहीं करते ........ऐसे सनकी लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं और हमारे समाज में भी व्याप्त हैं .......आपका दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रश्न कि एक पिता का अपने बच्चों से इस हद तक नफरत आपको स्वीकार्य नहीं लेकिन जिस इंसान ने पत्नी को ही स्वीकार न किया हो उसके लिए वो बच्चे क्या महत्त्व रखते होंगे जरा सोचिये ........उसे तो वो बोझ लगते होंगे , उसकी आगे की मंजिल में रुकावट .........आखिर कौन उससे ब्याह करेगा जब जानेगा कि बच्चे भी हैं उसके जबकि उसका मकसद तो सिर्फ जया को अपमानित कर दूसरी शादी करना था ...........पता नहीं आपने उपन्यास पूरा पढ़ा या नहीं ..........यदि पढ़ा होता तो ये बातें आपके सामने आतीं और आप ये प्रश्न नहीं उठाते ........ये हमारे समाज में ही मिलते हैं हमारे आस पास ही .......और कुछ हद तक मैंने भी देखे हैं ऐसे लोग जो दूसरों के आगे इतने अच्छे बन जाते हैं कि आप सोच नहीं सकते कि घर के लोगों के साथ ये आदमी कैसा होगा ........उम्मीद है अब आपकी आशंका ख़त्म हो गयी होगी .

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