शनिवार, 30 जून 2018

प्रति प्रश्न : एक दृष्टि


प्रति प्रश्न : एक दृष्टि

सुरेन्द्र कुमार नायक के ‘प्रति प्रश्न’ उपन्यास में उपभोक्तावाद, बाजारीकरण तथा मूल्यहीनता के दाह परिलक्षित होते हैं. इस कृति का अधिकांश कथ्य वर्णात्मकता के माध्यम से प्रस्तुत हुआ है. वस्तुविधान रत्नेश, निधि, विजय, संता, रंजन, निमिष, डॉ० तिवारी तथा यत्किंचित रायबहादुर प्रभंज सिंह जू देव के इर्द-गिर्द घूमता है. रायबहादुर प्रभंज सिंह जू देव का पुत्र रत्नेश एक महाविद्यालय में प्राचार्य है. अतिसुन्दर निधि से रत्नेश की शादी होती है. आगे और अधिक शिक्षित होने के लिए रत्नेश निधि को घर में ही पढ़ाने के लिए अपने मित्र विजय को नियोजित कर देता है.

इस घटना के बाद ही कथा विन्यास में एक मोड़ आता है, जिसमें उपभोक्तावाद की गोद में पल रही वासनामूलक विलासिता के अनेक परिदृश्य विवक्षित हैं. कृतिक ने भूमंडलीकरण के कारण शनैः-शनैः भारतीय जीवन-मूल्यों तथा नैतिकताओं को परिवर्तित और बहिष्कृत दिखाया है. दिव्य गुणों से समलंकृता भारतीय नारी का यह भोगवादी अवतार रत्नेश की पत्नी निधि के माध्यम से व्यक्त होता है. पहले वह विजय - जो एक प्रवक्ता है और उसे पढ़ाने में सहयोग करता है – को अपनी देह-लिप्सा में आबद्ध करती है फिर कई पीढ़ियों से रत्नेश की खेती-बाड़ी देखने वाले युवक संता को रति-कर्म के लिए विवश करती है, फिर रत्नेश के साथ ही प्रवक्ता पद पर कार्यरत रंजन को अपनी भोगलिप्सा का साथी बनाती है. घर का सम्पूर्ण सात्त्विक परिवेश तहस-नहस हो जाता है. इस सबकी जानकारी होने पर रत्नेश को हृदयाघात होता है. महाविद्यालय के प्रबंधक वर्मा जी इस स्थिति में निधि को कॉलेज में प्रवक्ता के रूप में नियुक्त कर देते हैं. कुएं से निकल कर समुद्र में आई निधि ने स्वयं को ऐन्द्रिय  भोगों से सराबोर कर दिया. इन कृत्यों के प्रभाव के रूप में निधि की बेटी कंगना से रंजन छलात्कार करता है और कंगना को कोर्ट मैरिज के लिए बाध्य कर देता है.

वासना की आँधियों से झकझोरा गया यह उपन्यास कई प्रश्न उत्पन्न करता है. उसमें से एक प्रमुख है कि देहमूलक विलासिता से सने इस उपन्यास को क्यों लिखा गया? ऐसे सवाल सांचे की ज़िन्दगी को ही स्वीकार करते हैं. त्याग, बलिदान जैसे मूल्यों तथा स्मृतिदर्शित सामाजिकता से ओत-प्रोत साहित्य की ही ऐसे लोग सराहना कर सकते हैं. यथार्थ से दूर भागकर रचनाकार तथा पाठक समाज की विडम्बनाओं, कुत्साओं तथा अस्तित्वखण्डन को नहीं रोक सकते जो वस्तुतः घटित हो रहा है, उसे अनावृत्त करके ही इन समस्याओं को हल करने के उपाय खोजे जा सकते हैं.

वर्णनात्मक शैली में लिखा गया उपन्यास इक्कीसवीं शताब्दी का श्वेतपत्र है. यह समाज की ऐसी झाँकी प्रस्तुत करता है, जिसमें राष्ट्र परिवार विश्व परिवार की वक्र-चेतना के परिदृश्यों के आभास प्रतीत होते हैं. भाषा को सरल रखने का प्रयास किया गया है किन्तु कहीं-कहीं तत्सम शब्दों का साभिप्राय सन्निवेश कृति को बोझिल बनाता है. विम्बविधान की दृष्टि से भी यह कृति प्रशंसनीय है. इतने व्यापक वस्तु-विन्यास के लिए लेखक को और पन्ने खर्च करने चाहिए थे ताकि घटनाचक्रों की रेल-पेल से यह उपन्यास मुक्त रहता. आत्माभिव्यक्ति किसी भी रचना की जीवन्तता की परिचायक है. आत्माभिव्यक्ति की दृष्टि से यह कृति पारदर्शी प्रतीतियों का शिलालेख है. प्रसाद गुण से संपन्न इस कृति में मुहावरों और अलंकारों का प्रयोग कथा-वस्तु की संप्रेषणीयता को सहज और बोधगम्य बनाता है. वैदर्भी रीति तथा कोमलावृत्ति का सर्वत्र प्रयोग हुआ है. कुछ स्थानों पर अंतर्द्वंद्व तथा मनोवैज्ञानिक धरातल इस कृति की अन्य विशेषताएं हैं.


डॉ० दिनेश चन्द्र द्विवेदी 
समीक्षक : डॉ० दिनेश चन्द्र द्विवेदी
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कृति : प्रति प्रश्न (उपन्यास)
लेखक : सुरेन्द्र कुमार नायक
प्रकाशक : पवनपुत्र पब्लिकेशन, शारदा नगर, लखनऊ
संस्करण : प्रथम, 2011
ISBN : 978-81-906345-7-1



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समीक्षक डॉ० दिनेश चन्द्र द्विवेदी जी द्वारा यह समीक्षा साहित्यिक पत्रिका 'स्पंदन' के लिए की गई थी. इसके कुछ दिन बाद उनका निधन हो गया. कतिपय कारणों से इसे प्रकाशित नहीं किया गया. 

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