मंगलवार, 17 नवंबर 2020

समाज के ताने-बाने का चित्र बनाती लघुकथाएँ

साहित्य की विभिन्न समर्थ विधाओं में एक विधा लघुकथा की भी है. लघुकथा को ज्यादातर लोग कहानी का छोटा रूप समझ लेते हैं जबकि वास्तविकता में ऐसा नहीं है. लघुकथा अपने आपमें एक सम्पूर्ण विधा है, एक स्वतंत्र विधा है. अपने छोटे स्वरूप में एक सन्देश देने का काम इसके द्वारा होता है. ऐसा ही कुछ उमेश मोहन धवन जी अपने पहले लघुकथा संग्रह में करते हैं. यद्यपि यह लेखक का पहला लघुकथा संग्रह है तथापि लघुकथा लेखन का उनका अनुभव बहुत पुराना है. मूल रूप में उनकी प्रकाशित लघुकथाओं का संग्रह अब पाठकों के लिए सामने आया है.


मेरी लघुकथायें शीर्षक से उनकी 65 लघुकथाएं सामाजिकता के ताने-बाने में लिपटी हैं. उनकी लघुकथाओं को पढ़ते समय एहसास होता है कि वे सभी घटनाएँ हमारे आसपास की हैं, हमारे बीच की हैं. यह किसी भी रचनाकार का सशक्त लेखकीय पक्ष होता है कि वह अपनी रचनाओं के साथ पाठकों का तादाम्य स्थापित कर दे. प्रथम पुरस्कार, मुबारकबाद, दूरी के द्वारा वे समाज की मानसिकता से परिचय करवाते हैं कि किस तरह व्यक्ति स्वार्थ में लिप्त है. उसका दोहरा चरित्र इनके द्वारा सामने आता है. अफ़सोस, पाँच मिनट, पाँच सौ रुपये लघुकथाओं के द्वारा लेखक ने सरकारी मशीनरी की कार्यप्रणाली को दर्शाया है. दो-चार लघुकथाएँ नहीं बल्कि सभी लघुकथाएँ समाज के किसी न किसी पक्ष को, व्यक्ति की किसी न किसी मानसिकता को दर्शाती हैं.


उमेश जी की लघुकथाओं में सामाजिकता है, विषमता है, करुणा है, संक्षेप में कहा जाये तो समाज में विद्यमान सभी पहलुओं को समाहित किये हैं. भाषाई दृष्टि से वे अपनी लघुकथाओं को बोझिल नहीं बनाते हैं. सहज और सरल भाषा में सभी लघुकथाएँ आमजन की भाषा, बोली में पाठकों को आकर्षित करती हैं. भाषा, शब्दों का सामान्य और सरल प्रवाह पाठकों को लघुकथाओं से सहजता से जोड़ देता है. इस कारण से वह लघुकथाओं को बिना पढ़े रह नहीं पाता है.


लघुकथाओं की मुख्य विशेषता उसका अंत माना जाता है. लघुकथा का अंत एक रहस्य के साथ होता है. आरम्भ से चली आ रही कथा का अचानक से परिवर्तन लघुकथा की सफलता मानी जाती है. रोचक कलेवर प्रस्तुत करने के बीच कुछ लघुकथाएँ अपनी विधा की मूल विशेषता ‘रहस्य को बनाये रखना’ का अतिक्रमण करती हैं. ऐसा इसलिए भी समझ आता है क्योंकि उमेश जी लघुकथा के प्रवाह अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप करने से बचते समझ आते हैं. बावजूद इसके उनका पहला लघुकथा संग्रह संग्रहणीय है साथ ही अगले लघुकथा संग्रह की माँग को उत्पन्न करता है.

 

समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

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कृति : मेरी लघुकथायें (लघुकथा संग्रह)

लेखक : उमेश मोहन धवन

संस्करण : प्रथम, 2020

पुस्तक प्राप्त करने के लिए 9839099287 पर संपर्क करें.

बुधवार, 13 नवंबर 2019

रमकल्लो के जीवन की सरगम है उसके पत्रों में


तकनीक से भरे दौर में चिट्ठी-पत्री की बात करना आश्चर्यजनक लग सकता है. इससे ज्यादा आश्चर्य की बात तो ये है कि कलम के द्वारा ग्रामीण संवेदनाओं को सहजता से उकेरने वाले लखनलाल पाल ने लगभग विलुप्त हो चुकी चिट्ठी-पत्री को उपन्यास का आधार बना दिया है. रमकल्लो की पाती के द्वारा उन्होंने एक अभिनव प्रयोग उपन्यास विधा में किया है. इस तरह का कोई प्रयोग उपन्यास में पहले हुआ हो तो इसकी जानकारी नहीं. 

लेखक द्वारा इससे पहले भी कई कृतियाँ ग्रामीण परिवेश पर आ चुकी हैं. वे स्वयं भी ग्रामीण क्षेत्र से वर्तमान तक गहराई से जुड़े हुए हैं, इसी कारण से उनके द्वारा ग्रामीण जीवन की अभिव्यक्ति अत्यंत सहज रूप से हो जाती है. ऐसा लगता है जैसे ग्रामीण जीवन उनकी कलम से स्वतः ही प्रवाहित होने लगता है, कागज़ पर सजने-संवरने लगता है. समीक्ष्य उपन्यास में लेखक ने एक ग्रामीण महिला के द्वारा लिखे गए पत्रों को आधार बनाते हुए उसकी मनोदशा, उसके संघर्ष, उसकी जिजीविषा, उसके आत्मविश्वास को उकेरा है. यह अपने आपमें अद्भुत कार्य है कि किसी महिला द्वारा अपने पति को लिखे गए पत्रों के आधार पर ग्रामीण जीवन का एक सार्थक चित्र उपन्यास के रूप में पाठकों के सामने रख दिया जाये.

जैसा कि कृति के नाम से ही आभास होता है कि यह एक महिला रमकल्लो के द्वारा लिखे पत्रों की कहानी है. उसका पति गाँव से दूर दिल्ली में मजदूरी करने गया हुआ है. उसकी पत्नी रमकल्लो, जिसने अपनी दृढ इच्छाशक्ति से पढ़ना-लिखना सीखा, अपने पति को नियमित रूप से पत्र लिखती है. उसके पत्रों में उसकी अपनी विवशता, घर, खेतों, जानवरों की देखभाल सम्बन्धी समस्या तो है ही साथ ही गाँव के अन्य समाचारों से भी अपने पति को अवगत कराना है. गाँव में रहकर ही हाईस्कूल की परीक्षा पास कर चुकी रमकल्लो ने अपने पत्रों के द्वारा वर्तमान समाज की, सरकारी मशीनरी की, अव्यवस्था आदि की भी तस्वीर सामने रखी है. नोटबंदी की घटना रही हो या फिर परीक्षाओं में मूल्यांकन के दौरान परीक्षार्थियों की उत्तर पुस्तिका से रुपये निकलने के किस्से, ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय बनवाए जाने सम्बन्धी कार्य, जॉब कार्ड में की जाने वाली अनियमितताएं आदि के अनुभव से सामने आये हैं.

ऐसा नहीं है कि उसके द्वारा सिर्फ अपनी बात की गई है. वह गाँव में खुद को सक्रिय बनाये हुए है. गाँव के अराजक लोगों के खिलाफ भी वह न केवल खड़ी होती है वरन पुलिस में उनकी शिकायत भी करती है. गाँव की महिलाओं को अत्याचार से बचाने में आगे आती है तो गाँव की बेटी के विवाहोपरांत आये संकट को दूर कर उसे उसके पति से भी मिलाती है. यह चित्रण किसी भी ग्रामीण महिला के सशक्त होने की कहानी कहता है. इसी सशक्तता के चलते रमकल्लो प्रधानी के चुनावों में भी उतरती है. इसके पीछे उसका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं, बालिकाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त करना है. रमकल्लो की कहानी का इसे सार भर समझा जाए. असल आनंद तो उसके पत्रों को स्वयं पढ़कर ही उठाना होगा.

बहरहाल, लखनलाल पाल की इस कृति की विशेषता यह रही है कि पत्रों में किसी तरह की बोझिलता नहीं है. एक पत्र के समाप्त होते ही स्वतः दूसरा पत्र पढ़ने की उत्कंठा पैदा होती है. पत्र आपस में जुड़कर एक कथा का, ग्रामीण परिवेश का वातावरण निर्मित करते हैं. पाठक आसानी से इसके साथ अपना तादाम्य स्थापित कर लेता है. अत्यंत सरल, रोचक भाषा में लिखे गए पत्रों में ग्रामीण अंचल (बुन्देली) के शब्द स्वतः ही जन्मते रहते हैं. ऐसा कहीं नहीं लगा है कि उनको जबरन ठूंसने का काम किया गया है. इसके साथ-साथ लेखक ने संवेदना को प्रमुखता देते हुए पत्रों के माध्यम से एक ग्रामीण महिला की, ग्रामीण परिवेश का अंकन दिया है. अनेक स्थल ऐसे बन पड़े हैं जहाँ मार्मिकता स्पष्ट रूप से पाठकों को झकझोर जाती है. रमकल्लो के पत्र पाठकों को हँसाते-हँसाते रुला देने का और आँसू लाने की स्थिति के साथ ही मुस्कराहट भर देने का काम करते हैं.

लखनलाल पाल की यह कृति निश्चित ही पठनीय है. उपन्यास विधा में इस अनुपम प्रयोग के लिए वे साधुवाद के पात्र हैं. इस कृति के द्वारा किसी न किसी रूप में उन्होंने विलुप्त हो जा रही पत्र विधा को भी जीवित करने का कार्य किया है.

समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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कृति : रमकल्लो की पाती (उपन्यास)
लेखक : लखनलाल पाल
प्रकाशक : रश्मि प्रकाशन, लखनऊ
संस्करण : प्रथम, 2019
ISBN : 978-93-87773-77-6


सोमवार, 27 मई 2019

असामान्य से असाधारण होने की यात्रा है विटामिन ज़िन्दगी


विटामिन ज़िन्दगी किसी एक व्यक्ति की कहानी मात्र नहीं वरन सन 1976 में जन्मे एक असामान्य बच्चे के असाधारण होकर राष्ट्रीय रोल मॉडल बनने की यात्रा है. इस यात्रा का चयन वह बालक अपने लिए स्वेच्छा से नहीं करता है बल्कि उसकी प्रकृति माँ स्वयं आकर उसका चयन करती है. इस चयन के लिए एक पल को वह पूछना ही चाहता है कि सिर्फ उसका ही चयन क्यों मगर बचपन से आत्मविश्वास के और सकारात्मक सोच के धनी उस बालक ने तत्काल विचार किया कि उसकी प्रकृति माँ द्वारा किसी अन्य को बचाने की दृष्टि से उसका चयन इसके लिए किया है. महज चार वर्ष की अवस्था में दौड़ते, कूदते, फुर्तीले बालक को बुखार के साथ चुपचाप चले आये पोलियो ने खड़ा न होने देने की ठान ली थी तो उस बालक ने भी अपनी उड़ान को निरंतरता देने की ठान रखी थी. वह बालक ललित आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच के साथ हर बार, हर ठोकर पर और जीवट बनता रहा, हर दर्द पर और सक्षम होता रहा.  

दिल्ली की गलियों में आते-जाते गिरने वाला बालक, स्कूल की खड़ी सीढ़ियाँ जीवंतता के साथ अपने क़दमों से नापने वाला बालक, देरी से आने पर स्वाभिमान के साथ अपनी शारीरिक स्थिति को दरकिनार रखते हुए शिक्षक को सजा देने के लिए कहने वाला बालक एक दिन रोल मॉडल बनकर सबके सामने आएगा ये किसी ने नहीं सोचा था. उस बालक ने भी नहीं मगर उसके दिल में यह ज़ज्बा अवश्य था कि उसे वह सब करके दिखाना है जो उसके साथ के बच्चे कर रहे हैं या कहें कि उससे अधिक करना है. उनसे बहुत आगे जाना है, बहुत ऊँचाई पर उड़ना है. ऐसे में चीन की दीवार पर जाकर खड़े होना, स्टोन बॉय से मिलकर अपनी भावनात्मक यादों को ताजा करना, संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ मिलकर कार्य करने की वैश्विक क्षमता का विकास करना, विदेश जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करके अपनी शारीरिकता पर बौद्धिकता की विजय को साबित करना आदि उस बालक के असाधारण बनने की राह के विभिन्न पड़ाव बनते चले गए.

इन पड़ावों की सफलतम पहुँच के दौरान वह बालक बचपन से कष्ट का, दर्द का, पीड़ा का प्रकृति माँ द्वारा ओढ़ाया गया आँचल ओढ़े रहा. एक-दो दिनों की नहीं महीनों, सालों की, पल-पल की कष्टकारी प्रक्रिया संभवतः किसी यातना से कम नहीं. बावजूद इसके उस बालक में, बालक से युवा बनते ललित में आगे ही आगे बढ़ते जाने की ललक पल भर को कम नहीं हुई. विटामिन ज़िन्दगी को कथा, उपन्यास आदि के रूप में पढ़ने की मंशा लेकर शायद कुछ हाथ नहीं लगे मगर जब इसके द्वारा ललित से मिलने की कोशिश की जाएगी, खुद को भीड़ से अलग रखकर देखने की चाह पैदा की जाएगी तो एहसास जागेगा कि पृष्ठ दर पृष्ठ जिस पीड़ा का चित्रण एक-एक शब्द करने में लगे हैं, ललित ने उस पल-पल पीड़ा को अपने साथ-साथ चलते देखा है, पलते देखा है, बढ़ते देखा है. शारीरिक कष्ट की इस पीड़ा से ज्यादा कष्टकारी पीड़ा अवश्य ही वह रही होगी जो कि समाज की मनोदशा से, उसकी प्रतिक्रिया से मिलती रही. कदम दर कदम चलती गतिविधि के साथ-साथ शारीरिक रूप से भिन्न क्षमताओं वाले लोगों के प्रति समाज कितना असंवेदनात्मक रवैया, मानसिकता अपनाता है इसे सहज देखा-एहसास किया जा सकता है. सच तो यह है कि विटामिन ज़िन्दगी महज पुस्तक नहीं, एक कृति नहीं, खुद ललित द्वारा लिखे गए संस्मरण मात्र नहीं हैं वरन ललित के रूप में ललित से मिलने का सफ़र है. इस सफ़र का आनंद उसी को आएगा जो ललित से मिलने की चाह रखता है.

समीक्षात्मक रूप से किसी के जीवन को आँकना किसी के लिए भी सहज नहीं होता. खुद हमारे शब्दों में यह न तो उस पुस्तक की समीक्षा है और न ही ललित की जीवन यात्रा का विश्लेषण, न उनके साथ-साथ दोस्ताना निभाते दर्द का चित्रण है. यह ललित के दर्द को समझने का प्रयास मात्र है, समाज की उस मानसिकता के साथ गुजरने का एहसास है, शरीर का अंग न होकर भी शरीर जैसी बनी उन बैसाखियों के साथ उड़ान भरने की प्रक्रिया मात्र है. उनके समर्पण कि यह पुस्तक उन्हें समर्पित है जो अलग हैं या भीड़ से अलग होना चाहते हैं, के साथ हम यह भी जोड़ना चाहते हैं कि यह पुस्तक उन सबके लिए भी एक विटामिन बने जो महज भीड़ का हिस्सा बने हुए हैं. यह पुस्तक उनके लिए भी असाधारण महत्त्व रखे जो समाज की बंधी-बंधाई सोच के साथ चलते रहते हैं. आखिर हम सभी को याद रखना चाहिए कि विटामिन ज़िन्दगी उसी के हिस्से आया है जिसने ज़िन्दगी को जिया है, बिताया नहीं है. विटामिन ज़िन्दगी से ऊर्जा पाते ललित का जीवन सम्पूर्ण समाज को जीवन जीने की कला सिखाये, यही कामना है.

समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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कृति : विटामिन ज़िन्दगी (संस्मरण) 
लेखक : ललित कुमार
प्रकाशक : हिन्द युग्म, नई दिल्ली एवं एका, चेन्नई
संस्करण : प्रथम, 2019
ISBN : 9789388689175

शनिवार, 23 मार्च 2019

उनकी आँखों से यात्रा का सुख


जब कोई पुस्तक किसी ऐसे व्यक्ति की हो जो खुद आपमें ही समाहित हो तो उस पुस्तक को पढ़ने का आनंद अलग ही होता है. इस आनंद में और वृद्धि तब हो जाती है जबकि वह उस लेखक की पहली पुस्तक हो. यह बिंदु पढ़ने वाले को आनंदित और गौरवान्वित करता है. आनंद की सीमा यहीं आकर नहीं रुकती वह तब और बढ़ जाती है जबकि पुस्तक का विषय पढ़ने वाले के लिए नया हो. ऐसे ही गौरवान्वित करने वाले आनंद के क्षण हमारे लिए उस समय आये जबकि हमारे अभिन्न अनुराग ढेंगुला ने फोन से अपनी पहली पुस्तक के प्रकाशित होने की और उसे भेजने की जानकारी दी. पुस्तक हाथ में आते ही उसे पढ़ना और इसलिए भी बहुत गंभीरता से पढ़ना था क्योंकि यह अनुराग की पहली पुस्तक होने के साथ-साथ यात्रा वृतांत थी. हजारों पुस्तकों को पढ़ने के बाद भी यात्रा-वृतांत न के बराबर पढ़े हैं. चूँकि घूमने-फिरने की, सैर-सपाटा करने की, यात्रा-संस्मरण लिखने की हमारी खुद का शौक या कहें कि आदत में शामिल है, ऐसे में अनुराग की यात्रा-वृतांत ‘सागर से झील तक’ पढ़ने का, जल्द से जल्द पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे थे. अनुराग के यात्रा संस्मरणों का सुखद आनंद लिया जा रहा था. हर एक यात्रा से खुद को जोड़कर देखते हुए, पुस्तक के एक-एक पृष्ठ को खुद की कलम से उकेरा हुआ सा समझकर गौरव की अनुभूति की जा रही थी. उनकी यात्रा के आनंद में हम भी गोते लगा रहे थे कि हमें इस गौरवपूर्ण, आनंदमयी क्षणों से खुद अनुराग ने बाहर खींच लिया, जबकि उनका स्नेहिल आदेश मिला कि इसकी आलोचनात्मक टिप्पणी जल्द से जल्द चाहिए है. 

किसी भी पुस्तक, कृति की आलोचनात्मक टिप्पणी या समीक्षा करना हमारे लिए बड़ा ही रुचिकर कार्य है किन्तु कई बार बहुत कष्टकारी भी हो जाता है. कष्टकारी इस रूप में जबकि कृति किसी अपने की हो. ऐसा इसलिए क्योंकि हम इसे भूलकर कि पुस्तक किसकी है, कृति किसकी है निष्पक्ष रूप से समीक्षा करने का प्रयास करते हैं. जब निष्पक्ष समीक्षा की आलोचना की बात होती है तो फिर गुण-दोषों का समान रूप से विवेचन आवश्यक होता है. यहाँ दिमाग से, दिल से यह निकालना पड़ता है कि पुस्तक का लेखक कौन है, उस लेखक से क्या सम्बन्ध है. जहाँ तक अनुराग से सम्बन्ध की बात है तो इस पर कभी बाद में, अभी हाल-फ़िलहाल उसकी पुस्तक ‘सागर से झील तक’ के बारे में.

अनुराग की यह पुस्तक उनकी सात यात्राओं कन्याकुमारी, बद्रीनाथ धाम, गुरुवायुर, पचमढ़ी, राष्ट्रीय राजमार्ग 43, शिमला, लेह आदि का वृतांत है. रस्किन बांड के एक वाक्य ‘सभी मनुष्य मेरे दोस्त हैं, मुझे सिर्फ उनसे मिलना है’ से प्रेरित अनुराग विश्व बंधुत्व की भावना कि ‘सभी स्थान मेरे जाने-पहचाने हैं, मुझे बस वहां जाना है’ के साथ यात्राओं पर निकल कर उनका अनुभव ही नहीं देते हैं वरन उनके साथ जानकारियों का अनुपम भंडार भी खोल देते हैं. पुस्तक में संकलित यात्राओं में उनकी पहली यात्रा जो गोवा होते हुए कन्याकुमारी तक पहुँचती है, ट्रेन के अनुभवों, दक्षिण भारत के रोमांच का अनुभव तो कराती ही है साथ में जानकारियों से भी भर देती है. कोंकण रेलवे अपने निर्माण से लेकर अद्यतन लगातार रोमांच का विषय बना रहा है. इस सफ़र ने न केवल देशवासियों को वरन विदेशियों को भी अपनी तरफ आकर्षित किया है. इस यात्रा विवरण की विशेषता यही है कि जितनी जानकारी अनुराग गोवा के खुलेपन की देते हैं, कन्याकुमारी के बारे में देते हैं उससे कहीं अधिक जानकारी वे कोंकण रेलवे के बारे में देते हैं. निश्चित ही ऐसी जानकारी यात्रा के रोमांच को बढ़ाती है और ज्ञान में भी वृद्धि करती है. उनका रेल वृतांत जहाँ आगे की यात्रा के बारे में कौतूहल जगाता है वहीं क्रूज की सैर सागर से परिचय करवाता है.

ऐसा वे मात्र इसी यात्रा संस्मरण में नहीं करते हैं वरन लगभग सभी यात्रा-विवरणों में उनके द्वारा सम्बंधित क्षेत्र की, वहां की जीवन-शैली से सम्बंधित जानकारी प्रदान करने का प्रयास किया गया है. इसे लेह-यात्रा के संस्मरण में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है जबकि समुद्र तल से अधिक ऊँचाई पर होने के कारण होने वाली समस्या और उससे निपटने के लिए उपयोग की जाने वाली दवाई तक का जिक्र वे करते हैं. राष्ट्रीय राजमार्ग 43 की यात्रा के दौरान गुफाओं की खोज, उससे सम्बंधित पौराणिक कथाओं आदि का चित्रण लेखक के सजग मष्तिष्क की पहचान कराता है.

अनुराग के इस यात्रा-वृतांत की एक विशेष बात उन सभी को अवश्य ही आकर्षित करेगी जो उनसे परिचित हैं. उनके साथ बातचीत में शामिल होते हैं. उनके बात करने का अंदाज, उनकी शैली, शब्दों और वाक्यों का संयोजन जिस तरह से वे अपने रोजमर्रा के जीवन में करते हैं, उसी अंदाज में वे अपनी यात्रा के अनुभव पाठकों से साझा करते हैं. पूरी पुस्तक के पढ़ने के दौरान कहीं भी यात्रा विवरण पढ़ने जैसा एहसास नहीं होता है. ऐसा लगता रहता है जैसे अनुराग स्वयं सामने बैठकर अपनी यात्रा के बारे में बता रहे हैं. किसी भी स्थान पर कैसे पहुँचना हुआ, कैसे वहाँ के होटल में रुकना हुआ, कहाँ-कहाँ, कैसे-कैसे टहलना-घूमना हुआ इसका विवरण किसी भी तरह की साहित्यिकता के बोझ से लदा हुआ नहीं दिखाई देता है. शब्दों का सामान्य सा, दैनिक बोलचाल जैसा संयोजन उनकी यात्रा से पाठकों को जोड़ता है. ट्रेन में सामान रखने की स्थिति हो, भोजन करने की बात हो, प्लेटफ़ॉर्म पर ट्रेन का इंतजार करना रहा हो, सफ़र में अनजान यात्रियों के साथ अपनत्व का भाव बनाना रहा हो, भ्रमण-स्थलों के बाजारों अथवा दर्शनीय स्थलों को देखना-घूमना रहा हो, स्थानीय शब्दावली का प्रयोग और उसका अर्थ आदि को अनुराग बड़े ही सहज भाव से बताते से चलते हैं. एक बात निसंकोच इन यात्राओं के सन्दर्भ में कही जा सकती है कि इस वृतांत को पढ़ने के बाद यदि इन जगहों की सैर करने कोई पाठक जाये तो उसे कठिनाई का अनुभव नहीं होगा. उसे सम्बंधित दर्शनीय स्थल पहले से देखे हुए प्रतीत होंगे.

आलोचनात्मक दृष्टि से हमें आकर्षित करने वाली एक बात और दिखाई दी वह ये कि अनुराग के द्वारा अपने यात्रा अनुभवों में कहीं-कहीं हिन्दी फीचर फिल्मों के दृश्यों के द्वारा पाठकों को वहां की स्थिति समझाने का प्रयास किया गया है. यह प्रयोग संभवतः अपने आपमें अनूठा, अद्भुत कहा जायेगा. ऐसा इसलिए भी क्योंकि युवा पीढ़ी जिस तरह से फिल्मों को आत्मसात करती हुई उनके दृश्यों का आनंद लेती है, उसके लिए इन उदाहरणों से यात्रा को समझना सहज हो सकता है. अनुराग ऐसा प्रयोग करने में इसलिए सफल दिखते हैं क्योंकि वे पत्रकारिता के क्षेत्र से भी जुड़े रहे हैं. वर्तमान की मानसिकता को परखते हुए उसकी नब्ज पर हाथ रखने की कला इसी का सुखद परिणाम है. यात्रा के दौरान वे इसी पत्रकारिता अनुभव के कारण बारीक और गहराई भरी नजर रखने में भी सफल रहे हैं. इससे भी पुस्तक को रोचकता के साथ जानकारीपरक बनाने में सहायता मिली है.

‘सागर से झील तक’ पुस्तक पढ़ने के हमारे अनुभव को भले ही आलोचनात्मक या समीक्षात्मक टिप्पणी कह दिया जाये मगर ऐसा है नहीं. यह पुस्तक पढ़ने का अनुभव ही है जो अनुराग के साथ यात्राओं में लिया जा रहा है. पुस्तक के पढ़ने के दौरान लगा कि यदि अनुराग ने इसे डायरी शैली में लिखा होता तो शायद और अधिक आकर्षक विवरण सामने आये होते. ऐसा महसूस हुआ कि यदि उनकी यात्रा का अनुभव तिथिवार होता तो और अधिक रुचिकर बन सकता था. ऐसा इसलिए क्योंकि अनुराग तो अपनी यात्रा के विश्राम-काल में रात्रि को नींद के आगोश में चले जाते रहे मगर एक पाठक उनकी यात्रा में तारतम्यता के साथ विश्राम भी न कर सका. निश्चित रूप से आज के तकनीकी युग में जहाँ लोगों के पढ़ने के शौक कंप्यूटर, मोबाइल, किंडल पर विकसित हो गए हैं, बड़े-बड़े लेखों के स्थान पर छोटे-छोटे लेखों को वरीयता दी जाने लगी हो तब एक यात्रा का विस्तारपरक विवरण बहुत गंभीरता से शायद सभी लोग न पढ़ सकें. यदि ऐसी स्थिति किसी भी पाठक के साथ बनती है तो वह यात्रा संस्मरण के बीच संजोई गई गंभीर और ज्ञानवर्धक जानकारी से वंचित रह जायेगा. अनुराग को अपने यात्रा अनुभवों के साथ दी गई जानकारी के विस्तार के लिए उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटना ज्यादा समीचीन समझ आया.

इसके साथ-साथ सभी यात्राओं में विवरण की सार्थक और सकारात्मक जानकारी मिली मगर वे कन्याकुमारी में ऐसा करने से बचते से नजर आये. इसके पीछे एक कारण संभवतः यह जान पड़ा जो उनकी इस यात्रा के शीर्षक में स्पष्ट किया गया था. ‘दतिया से कन्याकुमारी वाया गोवा’ (रेलयात्रा वृतांत) शीर्षक से अपनी इस यात्रा को संजोने में अनुराग ने कई जगह विस्तार लिया मगर कन्याकुमारी में ऐसा नहीं किया. विवेकानन्द मेमोरियल, विवेकानन्द रॉक, तीन सागरों का मिलन-केंद्र, भारत के दक्षिणी सिरे का अंतिम बिंदु उनकी नज़रों से अचानक ही नहीं अछूता नहीं रह गया होगा. निश्चित ही इसके पीछे अनुराग की कोई न कोई कार्ययोजना रही होगी.

अनुराग की सागर से झील तक’ की यात्रा को महज यात्रा-वृतांत समझकर पढ़ने वालों को आरम्भ से ही पढ़ने के बजाय अनुराग के साथ भ्रमण करने जैसा आनंद मिलने लगेगा. यात्रा के दौरान की छोटी से छोटी घटनाओं को संकलित करते हुए वे अपनी यात्रा का अनुभव साझा नहीं कर रहे होते हैं बल्कि लगता है जैसे पाठकों के लिए भ्रमण का रूट-मैप निर्मित करते जा रहे हैं. ट्रेन संख्या, फ्लाइट संख्या, रेलवे स्टेशन, एअरपोर्ट, टैक्सी, होटल, छोटी-छोटी जगहों, चौराहों, बाजारों, कस्बों, खाद्य-सामग्रियों आदि के नाम सहित वर्णन नितांत उनके अनुभव बनकर ही नहीं रह जाते. उनकी परिजनों सहित यात्रा का आँखों देखा हाल भले ही उनकी थाती हो मगर निसंकोच कहा जा सकता है कि ‘सागर से झील तक’ पाठकों के लिए संग्रहणीय है, बिना यात्रा पर गए यात्रा का आनंद लेने का सुख है.


समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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कृति : सागर से झील तक (यात्रा-वृतांत)
लेखक : अनुराग ढेंगुला
प्रकाशक : नमन प्रकाशन, नई दिल्ली
संस्करण : प्रथम, 2019
ISBN : 978-81-8129-866-9

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2019

शब्दों के साथ लन्दन यात्रा


अमूमन लेखों में कहानियों से रोचकता और प्रवाह देखने को नहीं मिलता है किन्तु शिखा वार्ष्णेय के लेखों में ये दोनों तत्त्व सहजता से दिखाई देते हैं. उनके देशी चश्मे से लन्दन को देखने का जो आनंद है वह अपने आपमें किसी मेले में घूमने जैसा है. उनके इन लेखों के द्वारा लन्दन को लन्दन से बाहर रह कर देखा और समझा जा सकता है. इधर हाल के वर्षों में सोशल मीडिया की सहज उपलब्धता के चलते जिस तरह से लोगों पाठकीय धैर्य दिखाई देना कम हुआ है, उसे देखते हुए ये लेख मानक कहे जा सकते हैं. किसी लघुकथा की तरह आरम्भ होकर एक सुख, एक जिज्ञासा, एक जानकारी, एक लयबद्धता के साथ कब अंतिम बिंदु पर आकर ठहर जाता है इसका एहसास एक पाठक को उसी समय होता है जबकि उसे अगले लेख का शीर्षक दिखाई देता है. लन्दन और यहाँ के जीवन को इतना करीब से देखने के साथ-साथ बहुसंख्यक लेखों में वहाँ के और भारतीय जीवन के तुलनात्मक पल भी सामने आकर गुदगुदाते हैं.

अत्यंत सहज, सरल, बोधगम्य भाषा-शैली में लिखे लेखों में कुछ लेख दिल की गहराइयों तक उतर जाते हैं. आज भी अनेक बिंदु और विषय ऐसे हैं जिनको और पाश्चात्य जगत को लेकर भारतीय समाज में अजब तरह वातावरण बना रहता है. पाश्चात्य जगत में भी यदि बात इंग्लैण्ड, लन्दन की हो तो अजब वातावरण कौतूहल में, आश्चर्य में बदल जाता है. इस कौतूहल, आश्चर्य, सोच, मानसिकता को ऐसे लेखों के द्वारा सार्थक, सकारात्मक रूप से समझा-सुलझाया जा सकता है. कहाँ बुढ़ापा ज्यादा स्पष्ट रूप से पाश्चात्य देशों के बुजुर्गों के जीवन और भारतीय बुजुर्गों के जीवन के बारे में बने एकतरफा दृष्टिकोण की तरफ इशारा करता है. संयुक्त परिवार में हँसते-मुस्कुराते जीवन का व्यतीत होना, जो कभी बुड्ढा होने ही नहीं देती और आज़ादी में खलल न पड़े की मानसिकता से पश्चिमी व्यवस्था को अपनाना साबित करने लगा है कि बुड्ढों के जीने के लिए तो सिर्फ व्यवस्था ही जरूरी है. अन्धविश्वास की व्यापकता, यहाँ भी बाबा द्वारा समाज की लगभग एकसमान चेतना को चित्रित करने की कोशिश की गई है.

पुत्र छदम्मीलाल से बोले केसरी नंदन/हिन्दी पढ़नी होए तो जाओ बेटा लन्दन, ये दो पंक्तियाँ उनकी आँखें खोलने को काफी हैं जो अनावश्यक रूप से अंग्रेजी के पीछे भागते हुए अपने ही देश में हिन्दी की उपेक्षा करने में लगे रहते हैं. लन्दन में हिन्दी के प्रति असीम गर्व का भाव, भाषण प्रतियोगिताएं में धाराप्रवाह हिन्दी में बोलना दर्शाता है कि हिन्दी को पढ़ने, बोलने, समझने में उसे शर्मिंदगी का नहीं बल्कि अपनी संस्कृति, देश को जानने का माध्यम बन रहा है. हिन्दी गीतों का दौर, भारतीय टीवी सीरियल लन्दन में भारतीय पहुँच का परिचय देते हैं. इसके साथ-साथ अनेक लेखों में लन्दन की सामाजिकता का, वहाँ की मानसिकता का, राजनीति का, सोच का बोध होता है. पुस्तकालयों के प्रति प्रेम, अनावश्यक रूप से राजनीति में भीड़ का इस्तेमाल न होना, सडकों पर बिना कारण हॉर्न का प्रयोग न करना, शिक्षा की महत्ता, आम के आम और गुठलियों के दाम के रूप में विकसित शुक्राणु दान की अवधारणा आदि के माध्यम से लन्दन के बारे में जाना-समझा जा सकता है.

शिखा वार्ष्णेय के लेखों द्वारा राजसी वैभव से सम्बंधित पुरानी साख और गौरवपूर इतिहास को समझा जा सकता है तो यह भी समझा जा सकता है कि वहाँ की नई पीढ़ी तेज-तर्रार, इंसाफ पसंद तो है परन्तु असंवेदनशील और रिश्तों के प्रति उपेक्षित बिलकुल नहीं है. उनके द्वारा चित्रित लन्दन का वीआईपी कल्चर हमें उसी तरह अपनाने की बात सिखाता है जैसे कि हम पाश्चात्य संस्कृति अपनाते जा रहे हैं. गलियों के गैंग, महिलाओं के साथ अत्याचार जारी है, आपकी सुरक्षा आपके हाथ, बेरोजगारी की समस्या, बढ़ती स्वास्थ्य समस्या, सुरक्षित समाज का असुरक्षित युवा, जाँच की लाइन ऐसे लेख हैं जो भारतीय समाज में लन्दन अथवा पश्चिमी समाज को लेकर बनी कल्पनाओं से निकालकर उनको वास्तविकता से परिचय करवाते हैं.

निश्चय ही अपनी कलम से बाँधने की क्षमता के कारण शिखा वार्ष्णेय की देशी चश्मे से लन्दन डायरी लोगों को सिर्फ पढ़ने का अवसर ही नहीं देती है बल्कि इस देश के साथ-साथ लन्दन की गलियों की भी सैर कराती है. उनके शब्दों के सहारे पाठक खेल का मैदान, स्कूल का प्रांगण, थेम्स नदी का तट, त्यौहार-पर्व का आयोजन, मेले-बाजार की सैर करते हुए लन्दन से वापस अपने देश लौट आता है.


समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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कृति : देशी चश्मे से लन्दन डायरी
लेखक : शिखा वार्ष्णेय
प्रकाशक : समय साक्ष्य, देहरादून
संस्करण : प्रथम, 2019
ISBN : 978-93-88165-18-1


शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

खंडित और सुविधाजनक व्याख्याओं पर कुछ तो बोलो गंगापुत्र


भारतीय साहित्य, इतिहास परम्परा में व्याख्या, पुनर्व्याख्या की स्थापित मान्यता सदैव से रही है. ऐतिहासिक घटनाओं को काल, परिस्थितियों के अनुसार व्याख्यायित किया जाता रहा है. इसके पीछे व्यक्तियों की जिज्ञासा, अन्वेषण करने की प्रवृत्ति रही है. महाभारत का नायक कौन के जवाब अर्जुन के प्रतिप्रश्न के रूप में जब वाक्य उभरा कि एकलव्य या दुर्योधन क्यों नहीं हो सकता तो समाजविज्ञानी के रूप में सक्रिय लेखक के दिमाग में तमाम संकल्पनाओं ने जन्म लिया. आज घर-घर में महाभारत मचा हुआ है जैसे सार्वभौमिक वाक्य के आलोक में उन तमाम संकल्पनाओं का, जिज्ञासाओं का समाधान करने गंगापुत्र भीष्म को सामने आना पड़ा. निश्चित रूप से महाभारत महज एक युद्ध नहीं, एक गाथा नहीं, एक इतिहास नहीं, एक महाकाव्य नहीं वरन प्रत्येक समाज का एक सत्य है, जिसे उस कालखंड के सामाजिक सन्दर्भों में अपनी-अपनी तरह से परिभाषित किया गया है.

समाजविज्ञानी डॉ० पवन विजय अपने उपन्यास के बहाने वर्तमान कालखंड की सामाजिकता के तमाम प्रश्नों को उभारते हैं. महाभारत युद्ध में शरशैय्या पर पड़े भीष्म पितामह की जिज्ञासाओं के रूप में एक इन्सान की अनेकानेक जिज्ञासाओं पर मंथन करते हैं और उसे तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार सुलझाने का यत्न भी करते हैं. इतिहास हमेशा विजेताओं द्वारा लिखित होता है, इसलिए उसमें विजेताओं का यशोगान होना स्वाभाविक है, के द्वारा वे न केवल महाभारतकालीन विजेता पक्ष पर सवाल खड़ा करते हैं वरन वर्तमान सामाजिक विसंगतियों पर भी कटाक्ष करते हैं. नियति किसी के कर्म कभी निर्धारित नहीं करती. आप आज क्या करोगे, यह विधाता की लेखनी तय नहीं करती; बल्कि आप जो करोगे, उसके अनुसार आपको कौन सा कर्म करने को दिया जाये या आपकी कौन सी भूमिका बनायी जाये, यह नियति तय करती है, के द्वारा लेखक स्पष्ट रूप से अपने उपन्यास के द्वारा सन्देश देता है. तत्कालीन स्थितियों में उठाये गए कदमों की आहट वर्तमान में भी साफ़-साफ़ सुनाई देती है. कर्मफल के द्वारा केवल व्यक्ति की नियति ही निर्धारित नहीं होती वरन जड़-चेतन-प्रकृति-चर-अचर आदि सभी की नियति का निर्धारण होता है. स्पष्ट है कि जब कर्म के आधार पर नियति का निर्धारण होता है तो इतिहास का लेखन करने वालों को स्वाभाविक रूप से तटस्थता का भाव अपनाना चाहिए. उनको विजेताओं के साथ-साथ पराजितों का भी पक्ष सामने रखना चाहिए.

यही कारण है कि लेखक ने गंगापुत्र को अंत-अंत तक तमाम सारी जिज्ञासाओं, शंकाओं के वशीभूत दिखाया है. वे कृष्ण से लेकर काल और संजय तक से अपनी शंका के समाधान हेतु लगातार सवाल-जवाब करते रहे हैं. धर्म-अधर्म के नाम पर चले भीषण युद्ध की विभीषिका में वे खुद को, दुर्योधन को एक अलग खांचे में देखना चाहते हैं. उनके सवालों और उसकी अनुगूंज में उभरते जवाबों में लेखक ने विजेता और पराजित दोनों का समान पक्ष लेकर कहीं-कहीं कौरवों के प्रति सहानुभूति दर्शायी है और कई जगहों पर पांडवों को गलत ठहराया है. ऐसा उन्होंने भले ही गंगापुत्र अथवा अन्य पात्रों के द्वारा करवाया हो मगर यह उनकी सम्पूर्ण कथानक पर निरपेक्ष दृष्टि का परिचायक है. अश्वत्थामा हतो, नरो वा कुंजरो नामक जिस वाक्य से युधिष्ठिर का बचाव किया गया है, उस वाक्य को कहीं भी मैंने नहीं सुना, और न ही मेरे द्वारा कभी यह वाक्य अंकित किया गया, काल की यह स्वीकारोक्ति तत्कालीन प्रसंग के बीच से सत्य-असत्य के उदघाटन की राह प्रशस्त करती है.

सत्य-असत्य की इसी राह पर भीष्म व्यग्र हैं. खुद को सदैव हस्तिनापुर के सिंहासन से बाँधने के बाद भी वे कहीं न कहीं अंतर्मन से उचित-अनुचित में विभेद करने में संकोच भाव से घिरा पाते हैं. उनकी सदैव यही जानने की जिज्ञासा रही कि दुर्योधन ने जो किया क्या वो अधर्म था? उन्होंने जो कृत्य किये क्या वे इतिहास में उन्हें पाप का भागी बताएँगे? तभी वे काल से प्रश्न भी करते हैं कि जो कौरवों के भाग्य में था, वह उनके साथ हुआ, जो पांडवों के भाग्य में था उन्हें मिला ... फिर इन सबके बीच में मेरा सही अथवा गलत होना कैसे आ गया? क्या मैं इतना शक्तिशाली हो गया कि काल के कपाल पर लिखे अक्षरों को मेट डालता और उन पर नये शब्द रख देता? उनका यह प्रश्न महज प्रश्न नहीं वरन खुद को उस नियति से अलग करने की छटपटाहट है जो उनके व्यक्तित्व को सम्पूर्ण परिस्थितियों से बड़ा बनाती है. महाभारत युद्ध के जिस विकराल परिणाम को वे देख-समझ रहे हैं, उसमें वे खुद को केंद्रबिंदु माना जाना स्वीकार नहीं करना चाहते. यह जानते-समझते हुए भी युद्ध की आधारशिला के रूप में सत्यवती की महत्त्वाकांक्षा, शांतनु का काम और देवव्रत की प्रतिज्ञा ही प्रमुख है वे एकमात्र अंतिम कुरुवंशीय के रूप में युद्ध के आक्षेप से बाहर निकलना चाहते हैं.

उनकी इस व्यग्रता को बहुत हद तक उनकी माँ गंगा शांत करती है. भीष्म के भीष्म बने होने के कष्टमय समय के बीच उनकी माँ गंगा उनको देवव्रत रूप में समझाती है कि पुत्र देवव्रत! अपने मूल में जो है, उसके विरुद्ध कर्म करना और उसका परिणाम दोनों ही भयावह होता है, इसलिए अपनी चेतना को प्रकृति से जोड़ो और उसे जगाओ; उसका जागना ही तुम्हारे व लोक जीवन को मंगलमय मार्ग की ओर प्रशस्त करेगा. देखा जाये तो यह एक माँ गंगा का अपने पुत्र देवव्रत को दिया जाने वाला उपदेश नहीं वरन ज़िन्दगी का वो सार है जिसे समझने के बाद घर-घर में बने कुरुक्षेत्र स्वतः ही समाप्त हो जाएँ. यह मानवीय स्वभाव ही है जिसे बदलना सबके वश की बात नहीं होती है. लेखक ने इसे भीष्म पितामह के रूप में बड़े ही सुन्दर रूप में व्याख्यायित किया है. जिस व्यक्ति के पास इच्छामृत्यु पाने का आशीर्वाद हो, जो देवव्रत से भीष्म में परिवर्तित हो गया हो उसके बाद भी वह न केवल अपनी भूमिका के लिए वरन भविष्य में भी निर्धारित होने वाली अपनी भूमिका के लिए चिंतातुर बना हुआ है. लेखक कहता भी है कि मनुष्य होता ही ऐसा है; हर अस्तित्व पर प्रश्न करता है, पर स्वयं पर लगे प्रश्नचिह्नों पर चुप्पी लगा जाता है क्योंकि स्वयं को अस्वीकार करने का अर्थ है, स्वयं को अप्रमाणित करना, जिसे कोई व्यक्ति जीवित रहते कभी नहीं कर सकता. खुद भीष्म भी अपने को अप्रमाणित नहीं करना चाहते हैं. इसी के चलते वे सभी से अपने निर्णय पर सहमति-असहमति की मुहर लगवाना चाहते हैं. यही कारण है कि हर व्यक्ति अपना मूल्यांकन स्वयं करता है, और फिर उसकी स्वीकृति बाह्य जगत से चाहता है.

श्रीकृष्ण के रूप में और काल के साथ चलते संवादों से भीष्म को अपने सवालों के जवाब मिलते हैं और शांतचित्त, स्थिर होकर भीष्म का शरीर अलौकिक आभा से प्रकाशित होने लगता है. शंकाओं के शमन के साथ समाज को एक सन्देश देते हुए वे बैकुंठलोक को प्रयाण करने को तत्पर हो जाते हैं. मुक्ति के इस क्षण पर भी वे भली-भांति समझते हुए भी कि सभी अपने अनुसार इस गाथा को कहने सुनने को स्वतंत्र हैं, वे निश्चिन्त और आनंदित हैं. अट्ठावन दिनों की अपनी शरशैया यात्रा में इस युद्ध के पार्श्व में धर्म-अधर्म का स्वरूप जान चुके होते हैं. हस्तिनापुर के सिंहासन की रक्षा के वचन के पीछे की व्यक्तिनिष्ठता, वस्तुनिष्ठता को पहचान गए होते हैं. कदाचित उनके द्वारा लेखक का भी यही अभीष्ट रहा होगा कि वर्तमान समाज अपने धर्म-अधर्म को पहचाने. वर्तमान समय की सामाजिकता के मूल में छिपी कर्तव्य भावना के बोध को उभारे. मन-वचन-कर्म के साथ-साथ उसकी वस्तुनिष्ठता, व्यक्तिनिष्ठता को पहचाने.

संवाद-शैली में लिखे गए उपन्यास में युद्ध के बाद की स्थिति, परिस्थिति, कालखंड को उकेरने में जिस काल्पनिकता का समावेश लेखक ने किया है वह अद्भुत है. सोचा जा सकता है कि करोड़ों-करोड़ लोगों के हताहत होने पर तत्कालीन युद्धक्षेत्र की दशा क्या रही होगी. बोलो गंगापुत्र के द्वारा मौन को तोड़ने की कोशिश, उनकी जिज्ञासाओं के समाधान के बीच कौरवों के धर्म की चर्चा करके लेखक ने निश्चित ही शोध के नए द्वार खोलने का प्रयास किया है. गवेषणा शक्ति से परिपूर्ण लोगों के लिए शोध के नए-नए और विरल आयाम इसके माध्यम से मिलते हैं. साहित्यकारों को भी विचार करना चाहिए कि वे पराजितों के इतिहास को भी पुनर्व्याख्यायित करें मगर पूर्वाग्रह-रहित होकर.

समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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कृति : बोलो गंगापुत्र (उपन्यास)
लेखक : डॉ० पवन विजय
प्रकाशक : रेडग्रैब बुक्स, इलाहाबाद
संस्करण : प्रथम2018
ISBN : 978-93-87390-25-6


शनिवार, 30 जून 2018

प्रति प्रश्न : एक दृष्टि


प्रति प्रश्न : एक दृष्टि

सुरेन्द्र कुमार नायक के ‘प्रति प्रश्न’ उपन्यास में उपभोक्तावाद, बाजारीकरण तथा मूल्यहीनता के दाह परिलक्षित होते हैं. इस कृति का अधिकांश कथ्य वर्णात्मकता के माध्यम से प्रस्तुत हुआ है. वस्तुविधान रत्नेश, निधि, विजय, संता, रंजन, निमिष, डॉ० तिवारी तथा यत्किंचित रायबहादुर प्रभंज सिंह जू देव के इर्द-गिर्द घूमता है. रायबहादुर प्रभंज सिंह जू देव का पुत्र रत्नेश एक महाविद्यालय में प्राचार्य है. अतिसुन्दर निधि से रत्नेश की शादी होती है. आगे और अधिक शिक्षित होने के लिए रत्नेश निधि को घर में ही पढ़ाने के लिए अपने मित्र विजय को नियोजित कर देता है.

इस घटना के बाद ही कथा विन्यास में एक मोड़ आता है, जिसमें उपभोक्तावाद की गोद में पल रही वासनामूलक विलासिता के अनेक परिदृश्य विवक्षित हैं. कृतिक ने भूमंडलीकरण के कारण शनैः-शनैः भारतीय जीवन-मूल्यों तथा नैतिकताओं को परिवर्तित और बहिष्कृत दिखाया है. दिव्य गुणों से समलंकृता भारतीय नारी का यह भोगवादी अवतार रत्नेश की पत्नी निधि के माध्यम से व्यक्त होता है. पहले वह विजय - जो एक प्रवक्ता है और उसे पढ़ाने में सहयोग करता है – को अपनी देह-लिप्सा में आबद्ध करती है फिर कई पीढ़ियों से रत्नेश की खेती-बाड़ी देखने वाले युवक संता को रति-कर्म के लिए विवश करती है, फिर रत्नेश के साथ ही प्रवक्ता पद पर कार्यरत रंजन को अपनी भोगलिप्सा का साथी बनाती है. घर का सम्पूर्ण सात्त्विक परिवेश तहस-नहस हो जाता है. इस सबकी जानकारी होने पर रत्नेश को हृदयाघात होता है. महाविद्यालय के प्रबंधक वर्मा जी इस स्थिति में निधि को कॉलेज में प्रवक्ता के रूप में नियुक्त कर देते हैं. कुएं से निकल कर समुद्र में आई निधि ने स्वयं को ऐन्द्रिय  भोगों से सराबोर कर दिया. इन कृत्यों के प्रभाव के रूप में निधि की बेटी कंगना से रंजन छलात्कार करता है और कंगना को कोर्ट मैरिज के लिए बाध्य कर देता है.

वासना की आँधियों से झकझोरा गया यह उपन्यास कई प्रश्न उत्पन्न करता है. उसमें से एक प्रमुख है कि देहमूलक विलासिता से सने इस उपन्यास को क्यों लिखा गया? ऐसे सवाल सांचे की ज़िन्दगी को ही स्वीकार करते हैं. त्याग, बलिदान जैसे मूल्यों तथा स्मृतिदर्शित सामाजिकता से ओत-प्रोत साहित्य की ही ऐसे लोग सराहना कर सकते हैं. यथार्थ से दूर भागकर रचनाकार तथा पाठक समाज की विडम्बनाओं, कुत्साओं तथा अस्तित्वखण्डन को नहीं रोक सकते जो वस्तुतः घटित हो रहा है, उसे अनावृत्त करके ही इन समस्याओं को हल करने के उपाय खोजे जा सकते हैं.

वर्णनात्मक शैली में लिखा गया उपन्यास इक्कीसवीं शताब्दी का श्वेतपत्र है. यह समाज की ऐसी झाँकी प्रस्तुत करता है, जिसमें राष्ट्र परिवार विश्व परिवार की वक्र-चेतना के परिदृश्यों के आभास प्रतीत होते हैं. भाषा को सरल रखने का प्रयास किया गया है किन्तु कहीं-कहीं तत्सम शब्दों का साभिप्राय सन्निवेश कृति को बोझिल बनाता है. विम्बविधान की दृष्टि से भी यह कृति प्रशंसनीय है. इतने व्यापक वस्तु-विन्यास के लिए लेखक को और पन्ने खर्च करने चाहिए थे ताकि घटनाचक्रों की रेल-पेल से यह उपन्यास मुक्त रहता. आत्माभिव्यक्ति किसी भी रचना की जीवन्तता की परिचायक है. आत्माभिव्यक्ति की दृष्टि से यह कृति पारदर्शी प्रतीतियों का शिलालेख है. प्रसाद गुण से संपन्न इस कृति में मुहावरों और अलंकारों का प्रयोग कथा-वस्तु की संप्रेषणीयता को सहज और बोधगम्य बनाता है. वैदर्भी रीति तथा कोमलावृत्ति का सर्वत्र प्रयोग हुआ है. कुछ स्थानों पर अंतर्द्वंद्व तथा मनोवैज्ञानिक धरातल इस कृति की अन्य विशेषताएं हैं.


डॉ० दिनेश चन्द्र द्विवेदी 
समीक्षक : डॉ० दिनेश चन्द्र द्विवेदी
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कृति : प्रति प्रश्न (उपन्यास)
लेखक : सुरेन्द्र कुमार नायक
प्रकाशक : पवनपुत्र पब्लिकेशन, शारदा नगर, लखनऊ
संस्करण : प्रथम, 2011
ISBN : 978-81-906345-7-1



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समीक्षक डॉ० दिनेश चन्द्र द्विवेदी जी द्वारा यह समीक्षा साहित्यिक पत्रिका 'स्पंदन' के लिए की गई थी. इसके कुछ दिन बाद उनका निधन हो गया. कतिपय कारणों से इसे प्रकाशित नहीं किया गया.