मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022

नव-स्पंदन से परिपूर्ण पुरुष हृदय की अनुभूतियों का संसार

दरवाज़ा खोलो बाबा! कविता की पंक्तियाँ अपने आपमें भाव का स्पष्ट प्रस्फुटन करती हैं. पराया कर देने जैसी मानसिकता के बराबर से अधिकारपूर्वक पुकार लगाने की भावना बदलते समाज का, बदलती मानसिकता का परिचय देती है.


जैसा कि काव्य-संग्रह की रचनाकार मोनिका शर्मा अपनी बात में स्पष्ट रूप से कहती हैं कि रचनाएँ बदलते परिवेश के अवलोकन और नव-स्पंदन से परिपूर्ण पुरुष हृदय की अनुभूतियों का लेखा-जोखा सा है. और भी बहुत कुछ सकारात्मक भाव में अपनी बात में वे कहती हैं, वह सब उनकी कविताओं में परिलक्षित भी होता है. साहित्यिक भाव-भूमि पर संभवतः यह विषय नया हो सकता है, इसलिए भी नया हो सकता है क्योंकि पिता के संवेदना का, भावनात्मकता का, सकारात्मकता का पहलू इस रूप में सामने लाने का प्रयास किया नहीं गया है. पिता को जब भी देखा-दिखलाया गया तो बस पुरुष रूप में और इसी कारण से उसमें कोमलता, स्नेहिलता, करुणा जैसी भावना के पक्ष पर विचार ही नहीं किया गया. मोनिका शर्मा के काव्य-संग्रह दरवाज़ा खोलो बाबा की कविताएँ पिता के उस रूप को प्रदर्शित करती हैं जो कदाचित कभी चर्चा में नहीं रहा है.


चार खण्डों में विभक्त भाव-बोध कुल 64 कविताएँ या कहें कि इतनी तरह की भावनाओं को समेटे पिता के रूप को बेटी की नज़रों से सामने आती हैं. पिता, पिता-बेटी, पुरुष-मन और प्रश्न खंड के रूप में भावनाओं को समेटे यह संग्रह पिता के दायित्व बोध को बखूबी बताता है. बहुत सीमित-समावृत होता है/आकाश पिता की इच्छाओं का/माता-पिता का कर्तव्यपरायण बच्चा होने के/दायित्वबोध की धुरी से/अपने बच्चों के उत्तरदायित्वों के/अक्ष तक सिमटा.


मेरे कम शब्द और गहरी आवाज़/अनुशासित अभिव्यक्ति का राज/वक्त की धूप में पककर/तुम समझ पाओगे/फिर मेरे मन के करीब आओगे... और जान जाओगे/इतना सब होकर भी/मैं भीतर से रीता हूँ/क्यूँकि मैं पिता हूँ. जैसी अभिव्यक्ति पिता के उस अव्यक्त पक्ष का चित्रण है जिसे समझा ही नहीं गया है. कभी माना ही नहीं गया कि पिता भी एक अदृश्य गठरी को उठाये जीवन-समर में लगातार संघर्ष कर रहा है. पुरुष की कठोरता का आवरण उसे ओढ़ाकर उसकी समग्र चेतना को एकपक्षीय बना दिया गया है. नहीं समझा जाता कि जीवन रण के हर संग्राम को जीतने/हर चक्रव्यूह को भेदने के/बावजूद-/पिता कभी विजेता नहीं कहे गए. इसे संयोग नहीं कहा जा सकता, इसे सहज भी नहीं कहा जा सकता बल्कि यह भी समाज के एक वर्ग को नजरंदाज करने जैसा कृत्य है.


पिता को पुरुष के खाँचे में बंद करके उसके व्यक्तित्व के तमाम पहलुओं को समाज में भले ही विस्मृत किया जाता रहा हो मगर एक बेटी के मन ने, उसके दिल ने, उसकी भावनाओं ने पिता को आदर्श व्यक्तित्व के रूप में ही देखा-जाना-समझा होता है. ऐसा तब से-/जब नहीं होता ज्ञान/स्त्री और पुरुष के बीच अंतर का भी/ना ही होती है समझ/कोई प्रतिमान गढ़ लेने की. बेटी की अपने पिता के प्रति कोमलकांत भावनाओं के कारण ही वह समझती है कि अपनी चिंताओं की चिट्ठियाँ/किसे लिखते पिता? तो वही बेटी पिता का माँ बनना देख, ममता की नई परिभाषा गढ़ते देख कह उठती है तुम्हारे मन के निर्वात/और मेरे मन की शून्यता को पूरने के लिए/पीहर आने और मिल बैठ-बतियाने के/आमंत्रण की एक चिट्ठी/मैंने अपने पते पर प्रेषित कर दी है.


कितना कोमल एहसास का भाव जागृत होता है जब किसी बेटी को अपने पिता का माँ बनना नजर आता है. उस पिता के व्यक्तित्व का कितना स्त्रियोचित गुण सामने आता है जब एक बेटी को पिता के-/हर बर्ताव/ लगाव/ भाव और चाव से/अब माँ की गंध आती है. इस रूप, इस गंध का स्मरण महज इसलिए नहीं होता कि अब माँ नहीं दिख रही है बल्कि इसलिए पिता के बाह्य कठोर रूप से अलग एक मासूम, निश्छल, कोमल स्वरूप दिखाई देता है. जीवन की भट्टी के ताप में/पुरुष भी गलाते हैं/स्वयं को का भाव उसी समय उपज सकता है जबकि इस कठोरता का दूसरा पक्ष भी समझ लिया गया हो. बिना एक पक्ष देखे दूसरे पक्ष का अवलोकन कर पाना सहज नहीं होता है.


भयभीत होते हैं पुरुष भी के द्वारा लेखिका ने पिता के उन तमाम रूपों के द्वारा पुरुष-मन को सामने रखा है जो घर में दबे पाँव लौटने पर घबराता है. घबराता है वह पुरुष अपनी माँ से, खौफ खाता है वह पुरुष अपनी पत्नी से और नन्हीं बिटिया से भी कम नहीं डरता/उनका ममताबोध/कि देर रात लौटे बाबा की पदचाप से/कहीं खुल ना जाये/लाड़ली की नींद, आखिर पुरुष रूप में एक पिता बसा होता है. डर के इस प्रेमपरक स्वभाव के साथ-साथ पलायन की पीड़ा को भी ये महसूस करते हैं, सहते हैं.


पिता के विविध रूपों, भावनाओं, एहसासों से परिचय करवाती हुईं मोनिका शर्मा अंत में सम्मान-संवेदना के मोर्चे पर अनुत्तरित कुछ सवाल भी छोड़ जाती हैं. ये सच है कि वर्तमान परिदृश्य में बहुत हद तक पुरुष मानसिकता में बदलाव हुआ है. उनके कार्यों, कार्य-शैली में भी परिवर्तन देखने को मिलने लगे हैं. घर, परिवार, जीवनसाथी आदि जैसे विभिन्न बिन्दुओं पर उनकी सकारात्मकता देखने को मिलने लगी है. इन तमाम सकारात्मक पक्षों के बाद भी सवाल उठता है कि स्वभाव से लेकर भाव विन्यास तक/अपना संशोधित संस्करण कब लाओगे तुम? यह सवाल उठना स्वाभाविक है क्योंकि अभी भी बहुत से पुरुष मन टीसते मन को नहीं टटोल पाते हैं. अभी भी पौरुषिक अहंकार उनको स्नेह, सहयोग जैसी भावना से दूर रखता है. हर थाप अनसुनी ही रही... क्यों? ऐसा सवाल है जो समाज में आज भी बहुतेरे पुरुषों के सामने खड़ा है. ऐसे सवालों का जवाब इसलिए भी मिलना अपेक्षित है क्योंकि एक इंसान की विमंदित सोच के/विचलन की यह डिग्री/समाज को हर कोण से डिगा देती है.


मोनिका शर्मा की पुकार दरवाज़ा खोलो बाबा निश्चित ही उस व्यक्तित्व को (विषय तो नहीं कहेंगे क्योंकि पिता सबकुछ हो सकते हैं मगर विषय नहीं हो सकते) विमर्श के केन्द्र में लाती है जिसके बारे में अभी तक सकारात्मक चिंतन किया नहीं जा सका. पिता के कठोर, अनुशासित, गम्भीर व्यक्तित्व के पीछे कोमल, उदार, संवेदित माँ जैसा स्वरूप भी छिपा होता है, बस उसे एक बेटी की नजर से देखने की आवश्यकता है.

 

समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

+++++++++++++++++++++++++

कृति : दरवाज़ा खोलो बाबा (कविता संग्रह)

लेखिका : डॉ० मोनिका शर्मा

प्रकाशक : श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली

संस्करण : प्रथम, 2021

ISBN : 978-93-92617-32-4

 


शनिवार, 12 फ़रवरी 2022

संवेदना, विश्वास और सशक्तिकरण की त्रिवेणी

तुम्हारी लंगी, शीर्षक देखते ही एक पल को दिमाग में जो चित्र उपजा था, वह चित्र इसी नाम की कहानी में देखने को मिला. शीर्षक देखकर उत्सुकतावश सबसे पहले इसी नाम से प्रकाशित कहानी को पढ़ा. कहानी को पढ़ते-पढ़ते दिमाग कहीं और ही घूमने लगता है. ऐसा लगता है जैसे कहानी कहीं हमारे आसपास ही चल रही है. ऐसा अनुभव होता है जैसे कहानी कहीं देखी हुई है. एक लड़की की कहानी, जिसका संसार चहारदीवारी तक सीमित रहा, कालांतर में उपजे स्नेहिल अंकुर में उसकी सीमा-रेखा अनंत को छूने लगती है. आमतौर पर इस विषय में जिस तरह का अंत दिखता है या कहें कि एक बंधी-बँधाई लीक पर कहानी चलते हुए पत्रों को और पाठकों को सुख का अनुभव कराती है, उससे कुछ अलग चलते हुए एक नया मानक स्थापित करती है.


कंचन सिंह चौहान की एक यही कहानी नहीं बल्कि सभी कहानियाँ अपनी कहानी के साथ-साथ समाज की स्त्री की कहानी कहती हैं. कुल नौ कहानियों को अपने में समेटे संग्रह केवल कहानियों की बात नहीं करता है बल्कि महिलाओं के संवेदित समाज की कहानी कहता है तो बहुत धीरे से उस पुरुष वर्ग की कहानी को भी सामने लाता है, जिसका मनोद्देश्य समाज पर, महिलाओं पर आधिपत्य स्थापित करना है. इस कहानी संग्रह में उन महिलाओं का संसार छिपा हुआ है जो एक तरफ समाज की अनेकानेक बुराइयों से लड़ती हुई आगे बढ़ने का प्रयास करती हैं, उसमें सफल होती हैं साथ ही वे महिलाएँ भी हैं जो इसके साथ-साथ अपनी शारीरिक परेशानियों पर भी विजय प्राप्त करती हैं.


इन कहानियों में महिलाओं के अपने परिवार से लड़ने की कहानी है, समाज से लड़ते हुए अपना मुकाम बनाने की कहानी है, खुद को स्थापित करने की कहानी है, महिलाओं के द्वारा स्वजनों को प्रोत्साहित करने की कहानी है, अपने परिजनों-मित्रों के संघर्षों में उनके साथ खड़े रहने की कहानी है. ऐसा करने के पीछे महिलाओं का खुद को स्थापित करने का, अपने व्यक्तित्व को सबसे ऊपर दिखाने का नहीं बल्कि अपने साथ के लोगों को आगे बढ़ाने का उद्देश्य है. इनके पीछे संवेदना है, सहानुभूति है, प्रेम है, सद्भावना है.


कंचन जी के इस संग्रह की विशेषता जो व्यक्तिगत तौर पर हमें समझ आई वो ये कि एक ही संग्रह की सभी कहानियाँ एक साथ दो मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखती हैं. इन कहानियों के द्वारा एक तरफ साहित्य में पिछले कई दशकों से छाये स्त्री-विमर्श, स्त्री-सशक्तिकरण की सुगंध की अनुभूति होती है तो दूसरी तरफ इन्हीं कहानियों में समाज के उस वर्ग की आवाज़ प्रस्फुटित हुई है जिसे समाज सिर्फ और सिर्फ सहानुभूति की नजर से देखता है. शारीरिक रूप से अक्षम या कमजोर न कहकर इन्हें शारीरिक रूप से अलग व्यक्तित्व कहा-समझा जा सकता है.


विकलांग शब्द को भले ही सरकार द्वारा दिव्यांग में परिवर्तित कर दिया गया हो मगर अभी समाज की मानसिकता में परिवर्तन नहीं आया है. इस मानसिकता में परिवर्तन का प्रयास तुम्हारी लंगी करना चाहती है. स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि स्त्री-सशक्तिकरण और दिव्यांग-सशक्तिकरण की धारा एकसाथ, एकरूप में तुम्हारी लंगी दिखाती है. हमारे व्यक्तिगत विचार में ये संग्रह सभी को पढ़ने की आवश्यकता है, विशेष रूप से उनको जो महिलाओं को, दिव्यांगजनों को आज भी तमाम सशक्त उदाहरणों के बाद भी समाज का कमजोर हिस्सा मानते हैं.

 

समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

+++++++++++++++++++++++++

कृति : तुम्हारी लंगी (कहानी संग्रह)

लेखिका : कंचन सिंह चौहान

प्रकाशक : राजपाल एंड संस, दिल्ली

संस्करण : प्रथम, 2020

ISBN : 9789389373332

 

 


बुधवार, 9 फ़रवरी 2022

सामाजिक विसंगति के बीच मर्यादा का प्रेम बसंत है फरवरी नोट्स

फरवरी नोट्स, शीर्षक देख कर ही कुछ अलग सा एहसास हुआ. पुस्तक पढ़ने के पहले यह एहसास कतई नहीं था कि यह किसी विवाहेतर प्रेमगाथा को अपने में समेटे होगी किन्तु इसका भान अवश्य हो रहा था कि इसमें जो कुछ भी है वह फरवरी माह की तरह गुलाबी अवश्य है. पूरब की कह लें या फिर पश्चिम की, सभी संस्कृतियों में फरवरी माह प्रेम का, प्यार का, बसंत का महीना सहज रूप में स्वीकारा गया है. प्रेम से जुड़ा यह महीना भी प्रेम की तरह कम ही है शेष महीनों से. प्रेम की तरह से कम इस रूप में कि यदि किसी को प्यार मिल भी जाये तो उसे कम लगता है और यदि किसी कारण से प्रेम की प्राप्ति नहीं होती तो वह अपने अधूरेपन के कारण भी कम रह जाता है.


प्रेम की स्थिति बड़ी विचित्र होती है. प्रेम होकर भी वह प्रेम जैसा नहीं होता और कहीं कुछ न होकर भी प्रेम से सराबोर प्रेम होता है. फरवरी नोट्स को किसी तरह से अलग तरह की प्रेम कहानी के रूप में नहीं देखा जा सकता है. इसमें यदि प्रेम का विषय उठाया गया है तो समाज की उस विसंगति की तरफ लेखक, डॉ. पवन विजय ने ध्यान आकृष्ट करवाया है जो इन दिनों आम है. समाज की वास्तविक दुनिया हो या फिर टीवी, फिल्मों की काल्पनिकता, सभी जगह विवाहेतर संबंधों का खुलकर चित्रण किया जा रहा है. साहित्य भी समाज का एक अंग है और उसमें भी वह सब घटित होता है जो समाज का हिस्सा है. यह हिस्सा गलत है या सही, इसका निर्धारण सबकी दृष्टि में अलग-अलग रूप में हो सकता है. फरवरी नोट्स की प्रेम कहानी संस्कारों का विध्वंस करती है, पूर्व-धारणाओं को तोड़ती है पर उसमें किसी तरह की हिंसा नहीं है. संबंधों में, रिश्तों में एक तरह का ध्वंस दिखाई देता है, विश्वास में एक तरह की दरकन दिखाई देती है मगर उसमें क्रूरता नहीं है. देह के प्रति आकर्षण है, प्रेम की उदात्त भावना का प्रदर्शन भी होता दिखता है मगर उसके द्वारा किसी का जीवन समाप्त नहीं किया जाता है. इस कहानी में तमाम सारी वर्जनाओं का अंत होता दिखता है मगर उसके द्वारा अशालीनता का निर्माण नहीं किया जाता है.


उपन्यास के चार मुख्य पात्र समर, आरती, रश्मि और प्रकाश हैं. कॉलेज के दिनों का संकोच भरा प्यार कालांतर में उम्र की परिपक्वता के बाद भी अपनी मासूमियत को खो नहीं पाता है. ऐसे में बरसों बाद आरती कॉलेज समय के अपने प्यार समर को सोशल मीडिया मंच पर खोज ही लेती है. कॉलेज के समय में किया गया सवाल मे आई फ्रेंडशिप विद यू को दोहराने के बाद अबकी समर भले ही उसका जवाब न दे पाता हो मगर दिल की भावना को भी छिपा नहीं पाता है. समर आरती के प्रस्ताव को मना नही कर पाता किन्तु एक तरह की जद्दोजहद में वह फँस जाता है. प्रेम को लेकर समर का द्वंद्व उसके व्यक्तित्व में इस तरह हावी रहता है कि उसके व्यवहार में भी एक तरह की अनिश्चतता दिखती रहती है.  


प्रेम के इस स्वरूप के दर्शन आये दिन समाज में होते रहते हैं, फिर भी सामाजिक रूप से यह स्थिति अभी स्वीकार्य नहीं हो सकी है. देखा जाये तो समाज के बहुत से हिस्सों में लिव इन रिलेशन को किसी न किसी रूप में मान्यता दे दी गई है, उसकी स्वीकार्यता को लेकर अब उतनी अनिश्चितता नहीं रह गई है मगर विवाहेतर संबंधों को लेकर अभी किसी तरह की सहमति जैसी स्थिति नहीं दिखती है. उपन्यास में विवाहेतर प्रेम की विसंगतियों को उठाया गया है किन्तु उसके द्वारा किसी एक ठोस निष्कर्ष को, समाधान को न तो पात्रों द्वारा और न ही लेखक द्वारा सामने नहीं रखा गया है. सुखांत देखने-सुनने के अभ्यस्त भारतीय समाज की नब्ज को जानते-समझते हुए लेखक ने अपने-अपने परिवार को छोड़कर चले आये समर और आरती को भटकाव में जाने से अवश्य ही रोका है. परिवार की महत्ता को समझते हुए दोनों अपने-अपने परिवार में वापस जाने की मनोदशा बना लेते हैं.  


उपन्यास के अन्त में आरती और समर का मूलभाव आदर्शात्मक व्यवस्था को बनाये रखने का रहा है. इसी कारण दोनों एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हुए, अपने को क्रूर और स्वार्थी न मानते-समझते हुए  अपने-अपने परिवार में वापस लौटने का निर्णय कर लेते हैं. देखा जाये तो समर और आरती में पल्लवित प्रेम के पीछे तरुणाई का प्रेमांकुर था. वह प्रेम का अंकुर परिवार के स्वस्थ, समग्र विकासमान होने के बाद भी एक-दूसरे के प्रति क्यों उत्कंठित हो उठा, इसे स्पष्ट रूप से दर्शाया नहीं गया है. उनके प्रेम के उपजने ने कालांतर में परिवार को बिखंडित किया. इसके बाद भी उन दोनों में अपने-अपने जीवनसाथियों से न तो घृणा न थी, और न ही उनके प्रति हिंसक भाव था. परिवार के प्रति दायित्व-भाव ने और आपसी प्रेम में मर्यादित भाव ने उन दोनों को मर्यादाविहीन न होने दिया. कहते हैं कि सुबह का भूला शाम को वापस आ जाये तो उसे भूला नहीं कहते, कुछ इसी तरह से अंत में उन दोनों ने वही किया जो समाज की मर्यादा के अनुकूल था. वे अपने बच्चों के साथ, अपने जीवनसाथियों के पास वापस लौटने को तैयार हो जाते हैं.  


उपन्यास का सर्वाधिक दिलचस्प हिस्सा वे चिट्ठियाँ हैं जो समर और आरती के मध्य लिखी जाती हैं. वर्तमान इन्टरनेट के, सोशल मीडिया के दौर में चिट्ठियों के माध्यम से बातचीत करना फरवरी नोट्स को विशेष बनाता है. देखा जाये तो इन पत्रों के माध्यम से लेखक को भरपूर अवकाश मिला है अपना जीवन-दर्शन व्यक्त करने का, अपने भाषाई लालित्य को प्रदर्शित करने का. यही कारण है कि समर और आरती के प्रेमपत्रों को पढ़कर बहुत बार ऐसा लगता है कि हम प्रेम-पत्र नहीं बल्कि दार्शनिक सौन्दर्य का आनंद उठा रहे हैं. चूँकि लेखक स्वयं में सामाजिक विज्ञानी हैं और भाषाई कलात्मकता बिखेरने के हुनर से परिपूर्ण हैं, ऐसे में उपन्यास के दो प्रेमियों की चिट्ठियों में भाषा-सौन्दर्य, लालित्य भाव बोध, अलंकारिकता का वैशिष्टय देखने को मिलता है.


सामाजिक जीवन के तमाम पक्षों को समेटे, ध्वंस और निर्माण का रास्ता बनाते हुए, सामाजिकता और असामाजिकता की महीन सी रेखा खींचते हुए, प्रेम के साथ करुणा को पोषित करते हुए विवेच्य उपन्यास दुखांत की तरफ जाता तो है किन्तु आदर्श, मर्यादा, संस्कार आदि के चलते वह सुखांत, सुखद राह पकड़ लेता है. यह अंत ही एक तरह से विवाहेतर सामाजिक विसंगति का समाधान है, भले ही यह पूर्ण और अंतिम समाधान न हो मगर समाधान की राह अवश्य बनाता है.


समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
+++++++++++++++++++++++++
कृति : फरवरी नोट्स (उपन्यास)
लेखक : डॉ. पवन विजय
प्रकाशक : हर्फ़ पब्लिकेशन, नयी दिल्ली
संस्करण : प्रथम, 2020
ISBN : 978-93-87757-43-1

मंगलवार, 17 नवंबर 2020

समाज के ताने-बाने का चित्र बनाती लघुकथाएँ

साहित्य की विभिन्न समर्थ विधाओं में एक विधा लघुकथा की भी है. लघुकथा को ज्यादातर लोग कहानी का छोटा रूप समझ लेते हैं जबकि वास्तविकता में ऐसा नहीं है. लघुकथा अपने आपमें एक सम्पूर्ण विधा है, एक स्वतंत्र विधा है. अपने छोटे स्वरूप में एक सन्देश देने का काम इसके द्वारा होता है. ऐसा ही कुछ उमेश मोहन धवन जी अपने पहले लघुकथा संग्रह में करते हैं. यद्यपि यह लेखक का पहला लघुकथा संग्रह है तथापि लघुकथा लेखन का उनका अनुभव बहुत पुराना है. मूल रूप में उनकी प्रकाशित लघुकथाओं का संग्रह अब पाठकों के लिए सामने आया है.


मेरी लघुकथायें शीर्षक से उनकी 65 लघुकथाएं सामाजिकता के ताने-बाने में लिपटी हैं. उनकी लघुकथाओं को पढ़ते समय एहसास होता है कि वे सभी घटनाएँ हमारे आसपास की हैं, हमारे बीच की हैं. यह किसी भी रचनाकार का सशक्त लेखकीय पक्ष होता है कि वह अपनी रचनाओं के साथ पाठकों का तादाम्य स्थापित कर दे. प्रथम पुरस्कार, मुबारकबाद, दूरी के द्वारा वे समाज की मानसिकता से परिचय करवाते हैं कि किस तरह व्यक्ति स्वार्थ में लिप्त है. उसका दोहरा चरित्र इनके द्वारा सामने आता है. अफ़सोस, पाँच मिनट, पाँच सौ रुपये लघुकथाओं के द्वारा लेखक ने सरकारी मशीनरी की कार्यप्रणाली को दर्शाया है. दो-चार लघुकथाएँ नहीं बल्कि सभी लघुकथाएँ समाज के किसी न किसी पक्ष को, व्यक्ति की किसी न किसी मानसिकता को दर्शाती हैं.


उमेश जी की लघुकथाओं में सामाजिकता है, विषमता है, करुणा है, संक्षेप में कहा जाये तो समाज में विद्यमान सभी पहलुओं को समाहित किये हैं. भाषाई दृष्टि से वे अपनी लघुकथाओं को बोझिल नहीं बनाते हैं. सहज और सरल भाषा में सभी लघुकथाएँ आमजन की भाषा, बोली में पाठकों को आकर्षित करती हैं. भाषा, शब्दों का सामान्य और सरल प्रवाह पाठकों को लघुकथाओं से सहजता से जोड़ देता है. इस कारण से वह लघुकथाओं को बिना पढ़े रह नहीं पाता है.


लघुकथाओं की मुख्य विशेषता उसका अंत माना जाता है. लघुकथा का अंत एक रहस्य के साथ होता है. आरम्भ से चली आ रही कथा का अचानक से परिवर्तन लघुकथा की सफलता मानी जाती है. रोचक कलेवर प्रस्तुत करने के बीच कुछ लघुकथाएँ अपनी विधा की मूल विशेषता ‘रहस्य को बनाये रखना’ का अतिक्रमण करती हैं. ऐसा इसलिए भी समझ आता है क्योंकि उमेश जी लघुकथा के प्रवाह अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप करने से बचते समझ आते हैं. बावजूद इसके उनका पहला लघुकथा संग्रह संग्रहणीय है साथ ही अगले लघुकथा संग्रह की माँग को उत्पन्न करता है.

 

समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

++++++++++++++++++++++

कृति : मेरी लघुकथायें (लघुकथा संग्रह)

लेखक : उमेश मोहन धवन

संस्करण : प्रथम, 2020

पुस्तक प्राप्त करने के लिए 9839099287 पर संपर्क करें.

बुधवार, 13 नवंबर 2019

रमकल्लो के जीवन की सरगम है उसके पत्रों में


तकनीक से भरे दौर में चिट्ठी-पत्री की बात करना आश्चर्यजनक लग सकता है. इससे ज्यादा आश्चर्य की बात तो ये है कि कलम के द्वारा ग्रामीण संवेदनाओं को सहजता से उकेरने वाले लखनलाल पाल ने लगभग विलुप्त हो चुकी चिट्ठी-पत्री को उपन्यास का आधार बना दिया है. रमकल्लो की पाती के द्वारा उन्होंने एक अभिनव प्रयोग उपन्यास विधा में किया है. इस तरह का कोई प्रयोग उपन्यास में पहले हुआ हो तो इसकी जानकारी नहीं. 

लेखक द्वारा इससे पहले भी कई कृतियाँ ग्रामीण परिवेश पर आ चुकी हैं. वे स्वयं भी ग्रामीण क्षेत्र से वर्तमान तक गहराई से जुड़े हुए हैं, इसी कारण से उनके द्वारा ग्रामीण जीवन की अभिव्यक्ति अत्यंत सहज रूप से हो जाती है. ऐसा लगता है जैसे ग्रामीण जीवन उनकी कलम से स्वतः ही प्रवाहित होने लगता है, कागज़ पर सजने-संवरने लगता है. समीक्ष्य उपन्यास में लेखक ने एक ग्रामीण महिला के द्वारा लिखे गए पत्रों को आधार बनाते हुए उसकी मनोदशा, उसके संघर्ष, उसकी जिजीविषा, उसके आत्मविश्वास को उकेरा है. यह अपने आपमें अद्भुत कार्य है कि किसी महिला द्वारा अपने पति को लिखे गए पत्रों के आधार पर ग्रामीण जीवन का एक सार्थक चित्र उपन्यास के रूप में पाठकों के सामने रख दिया जाये.

जैसा कि कृति के नाम से ही आभास होता है कि यह एक महिला रमकल्लो के द्वारा लिखे पत्रों की कहानी है. उसका पति गाँव से दूर दिल्ली में मजदूरी करने गया हुआ है. उसकी पत्नी रमकल्लो, जिसने अपनी दृढ इच्छाशक्ति से पढ़ना-लिखना सीखा, अपने पति को नियमित रूप से पत्र लिखती है. उसके पत्रों में उसकी अपनी विवशता, घर, खेतों, जानवरों की देखभाल सम्बन्धी समस्या तो है ही साथ ही गाँव के अन्य समाचारों से भी अपने पति को अवगत कराना है. गाँव में रहकर ही हाईस्कूल की परीक्षा पास कर चुकी रमकल्लो ने अपने पत्रों के द्वारा वर्तमान समाज की, सरकारी मशीनरी की, अव्यवस्था आदि की भी तस्वीर सामने रखी है. नोटबंदी की घटना रही हो या फिर परीक्षाओं में मूल्यांकन के दौरान परीक्षार्थियों की उत्तर पुस्तिका से रुपये निकलने के किस्से, ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय बनवाए जाने सम्बन्धी कार्य, जॉब कार्ड में की जाने वाली अनियमितताएं आदि के अनुभव से सामने आये हैं.

ऐसा नहीं है कि उसके द्वारा सिर्फ अपनी बात की गई है. वह गाँव में खुद को सक्रिय बनाये हुए है. गाँव के अराजक लोगों के खिलाफ भी वह न केवल खड़ी होती है वरन पुलिस में उनकी शिकायत भी करती है. गाँव की महिलाओं को अत्याचार से बचाने में आगे आती है तो गाँव की बेटी के विवाहोपरांत आये संकट को दूर कर उसे उसके पति से भी मिलाती है. यह चित्रण किसी भी ग्रामीण महिला के सशक्त होने की कहानी कहता है. इसी सशक्तता के चलते रमकल्लो प्रधानी के चुनावों में भी उतरती है. इसके पीछे उसका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं, बालिकाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त करना है. रमकल्लो की कहानी का इसे सार भर समझा जाए. असल आनंद तो उसके पत्रों को स्वयं पढ़कर ही उठाना होगा.

बहरहाल, लखनलाल पाल की इस कृति की विशेषता यह रही है कि पत्रों में किसी तरह की बोझिलता नहीं है. एक पत्र के समाप्त होते ही स्वतः दूसरा पत्र पढ़ने की उत्कंठा पैदा होती है. पत्र आपस में जुड़कर एक कथा का, ग्रामीण परिवेश का वातावरण निर्मित करते हैं. पाठक आसानी से इसके साथ अपना तादाम्य स्थापित कर लेता है. अत्यंत सरल, रोचक भाषा में लिखे गए पत्रों में ग्रामीण अंचल (बुन्देली) के शब्द स्वतः ही जन्मते रहते हैं. ऐसा कहीं नहीं लगा है कि उनको जबरन ठूंसने का काम किया गया है. इसके साथ-साथ लेखक ने संवेदना को प्रमुखता देते हुए पत्रों के माध्यम से एक ग्रामीण महिला की, ग्रामीण परिवेश का अंकन दिया है. अनेक स्थल ऐसे बन पड़े हैं जहाँ मार्मिकता स्पष्ट रूप से पाठकों को झकझोर जाती है. रमकल्लो के पत्र पाठकों को हँसाते-हँसाते रुला देने का और आँसू लाने की स्थिति के साथ ही मुस्कराहट भर देने का काम करते हैं.

लखनलाल पाल की यह कृति निश्चित ही पठनीय है. उपन्यास विधा में इस अनुपम प्रयोग के लिए वे साधुवाद के पात्र हैं. इस कृति के द्वारा किसी न किसी रूप में उन्होंने विलुप्त हो जा रही पत्र विधा को भी जीवित करने का कार्य किया है.

समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
+++++++++++++++++++++++++
कृति : रमकल्लो की पाती (उपन्यास)
लेखक : लखनलाल पाल
प्रकाशक : रश्मि प्रकाशन, लखनऊ
संस्करण : प्रथम, 2019
ISBN : 978-93-87773-77-6


सोमवार, 27 मई 2019

असामान्य से असाधारण होने की यात्रा है विटामिन ज़िन्दगी


विटामिन ज़िन्दगी किसी एक व्यक्ति की कहानी मात्र नहीं वरन सन 1976 में जन्मे एक असामान्य बच्चे के असाधारण होकर राष्ट्रीय रोल मॉडल बनने की यात्रा है. इस यात्रा का चयन वह बालक अपने लिए स्वेच्छा से नहीं करता है बल्कि उसकी प्रकृति माँ स्वयं आकर उसका चयन करती है. इस चयन के लिए एक पल को वह पूछना ही चाहता है कि सिर्फ उसका ही चयन क्यों मगर बचपन से आत्मविश्वास के और सकारात्मक सोच के धनी उस बालक ने तत्काल विचार किया कि उसकी प्रकृति माँ द्वारा किसी अन्य को बचाने की दृष्टि से उसका चयन इसके लिए किया है. महज चार वर्ष की अवस्था में दौड़ते, कूदते, फुर्तीले बालक को बुखार के साथ चुपचाप चले आये पोलियो ने खड़ा न होने देने की ठान ली थी तो उस बालक ने भी अपनी उड़ान को निरंतरता देने की ठान रखी थी. वह बालक ललित आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच के साथ हर बार, हर ठोकर पर और जीवट बनता रहा, हर दर्द पर और सक्षम होता रहा.  

दिल्ली की गलियों में आते-जाते गिरने वाला बालक, स्कूल की खड़ी सीढ़ियाँ जीवंतता के साथ अपने क़दमों से नापने वाला बालक, देरी से आने पर स्वाभिमान के साथ अपनी शारीरिक स्थिति को दरकिनार रखते हुए शिक्षक को सजा देने के लिए कहने वाला बालक एक दिन रोल मॉडल बनकर सबके सामने आएगा ये किसी ने नहीं सोचा था. उस बालक ने भी नहीं मगर उसके दिल में यह ज़ज्बा अवश्य था कि उसे वह सब करके दिखाना है जो उसके साथ के बच्चे कर रहे हैं या कहें कि उससे अधिक करना है. उनसे बहुत आगे जाना है, बहुत ऊँचाई पर उड़ना है. ऐसे में चीन की दीवार पर जाकर खड़े होना, स्टोन बॉय से मिलकर अपनी भावनात्मक यादों को ताजा करना, संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ मिलकर कार्य करने की वैश्विक क्षमता का विकास करना, विदेश जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करके अपनी शारीरिकता पर बौद्धिकता की विजय को साबित करना आदि उस बालक के असाधारण बनने की राह के विभिन्न पड़ाव बनते चले गए.

इन पड़ावों की सफलतम पहुँच के दौरान वह बालक बचपन से कष्ट का, दर्द का, पीड़ा का प्रकृति माँ द्वारा ओढ़ाया गया आँचल ओढ़े रहा. एक-दो दिनों की नहीं महीनों, सालों की, पल-पल की कष्टकारी प्रक्रिया संभवतः किसी यातना से कम नहीं. बावजूद इसके उस बालक में, बालक से युवा बनते ललित में आगे ही आगे बढ़ते जाने की ललक पल भर को कम नहीं हुई. विटामिन ज़िन्दगी को कथा, उपन्यास आदि के रूप में पढ़ने की मंशा लेकर शायद कुछ हाथ नहीं लगे मगर जब इसके द्वारा ललित से मिलने की कोशिश की जाएगी, खुद को भीड़ से अलग रखकर देखने की चाह पैदा की जाएगी तो एहसास जागेगा कि पृष्ठ दर पृष्ठ जिस पीड़ा का चित्रण एक-एक शब्द करने में लगे हैं, ललित ने उस पल-पल पीड़ा को अपने साथ-साथ चलते देखा है, पलते देखा है, बढ़ते देखा है. शारीरिक कष्ट की इस पीड़ा से ज्यादा कष्टकारी पीड़ा अवश्य ही वह रही होगी जो कि समाज की मनोदशा से, उसकी प्रतिक्रिया से मिलती रही. कदम दर कदम चलती गतिविधि के साथ-साथ शारीरिक रूप से भिन्न क्षमताओं वाले लोगों के प्रति समाज कितना असंवेदनात्मक रवैया, मानसिकता अपनाता है इसे सहज देखा-एहसास किया जा सकता है. सच तो यह है कि विटामिन ज़िन्दगी महज पुस्तक नहीं, एक कृति नहीं, खुद ललित द्वारा लिखे गए संस्मरण मात्र नहीं हैं वरन ललित के रूप में ललित से मिलने का सफ़र है. इस सफ़र का आनंद उसी को आएगा जो ललित से मिलने की चाह रखता है.

समीक्षात्मक रूप से किसी के जीवन को आँकना किसी के लिए भी सहज नहीं होता. खुद हमारे शब्दों में यह न तो उस पुस्तक की समीक्षा है और न ही ललित की जीवन यात्रा का विश्लेषण, न उनके साथ-साथ दोस्ताना निभाते दर्द का चित्रण है. यह ललित के दर्द को समझने का प्रयास मात्र है, समाज की उस मानसिकता के साथ गुजरने का एहसास है, शरीर का अंग न होकर भी शरीर जैसी बनी उन बैसाखियों के साथ उड़ान भरने की प्रक्रिया मात्र है. उनके समर्पण कि यह पुस्तक उन्हें समर्पित है जो अलग हैं या भीड़ से अलग होना चाहते हैं, के साथ हम यह भी जोड़ना चाहते हैं कि यह पुस्तक उन सबके लिए भी एक विटामिन बने जो महज भीड़ का हिस्सा बने हुए हैं. यह पुस्तक उनके लिए भी असाधारण महत्त्व रखे जो समाज की बंधी-बंधाई सोच के साथ चलते रहते हैं. आखिर हम सभी को याद रखना चाहिए कि विटामिन ज़िन्दगी उसी के हिस्से आया है जिसने ज़िन्दगी को जिया है, बिताया नहीं है. विटामिन ज़िन्दगी से ऊर्जा पाते ललित का जीवन सम्पूर्ण समाज को जीवन जीने की कला सिखाये, यही कामना है.

समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
+++++++++++++++++++++++++
कृति : विटामिन ज़िन्दगी (संस्मरण) 
लेखक : ललित कुमार
प्रकाशक : हिन्द युग्म, नई दिल्ली एवं एका, चेन्नई
संस्करण : प्रथम, 2019
ISBN : 9789388689175

शनिवार, 23 मार्च 2019

उनकी आँखों से यात्रा का सुख


जब कोई पुस्तक किसी ऐसे व्यक्ति की हो जो खुद आपमें ही समाहित हो तो उस पुस्तक को पढ़ने का आनंद अलग ही होता है. इस आनंद में और वृद्धि तब हो जाती है जबकि वह उस लेखक की पहली पुस्तक हो. यह बिंदु पढ़ने वाले को आनंदित और गौरवान्वित करता है. आनंद की सीमा यहीं आकर नहीं रुकती वह तब और बढ़ जाती है जबकि पुस्तक का विषय पढ़ने वाले के लिए नया हो. ऐसे ही गौरवान्वित करने वाले आनंद के क्षण हमारे लिए उस समय आये जबकि हमारे अभिन्न अनुराग ढेंगुला ने फोन से अपनी पहली पुस्तक के प्रकाशित होने की और उसे भेजने की जानकारी दी. पुस्तक हाथ में आते ही उसे पढ़ना और इसलिए भी बहुत गंभीरता से पढ़ना था क्योंकि यह अनुराग की पहली पुस्तक होने के साथ-साथ यात्रा वृतांत थी. हजारों पुस्तकों को पढ़ने के बाद भी यात्रा-वृतांत न के बराबर पढ़े हैं. चूँकि घूमने-फिरने की, सैर-सपाटा करने की, यात्रा-संस्मरण लिखने की हमारी खुद का शौक या कहें कि आदत में शामिल है, ऐसे में अनुराग की यात्रा-वृतांत ‘सागर से झील तक’ पढ़ने का, जल्द से जल्द पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे थे. अनुराग के यात्रा संस्मरणों का सुखद आनंद लिया जा रहा था. हर एक यात्रा से खुद को जोड़कर देखते हुए, पुस्तक के एक-एक पृष्ठ को खुद की कलम से उकेरा हुआ सा समझकर गौरव की अनुभूति की जा रही थी. उनकी यात्रा के आनंद में हम भी गोते लगा रहे थे कि हमें इस गौरवपूर्ण, आनंदमयी क्षणों से खुद अनुराग ने बाहर खींच लिया, जबकि उनका स्नेहिल आदेश मिला कि इसकी आलोचनात्मक टिप्पणी जल्द से जल्द चाहिए है. 

किसी भी पुस्तक, कृति की आलोचनात्मक टिप्पणी या समीक्षा करना हमारे लिए बड़ा ही रुचिकर कार्य है किन्तु कई बार बहुत कष्टकारी भी हो जाता है. कष्टकारी इस रूप में जबकि कृति किसी अपने की हो. ऐसा इसलिए क्योंकि हम इसे भूलकर कि पुस्तक किसकी है, कृति किसकी है निष्पक्ष रूप से समीक्षा करने का प्रयास करते हैं. जब निष्पक्ष समीक्षा की आलोचना की बात होती है तो फिर गुण-दोषों का समान रूप से विवेचन आवश्यक होता है. यहाँ दिमाग से, दिल से यह निकालना पड़ता है कि पुस्तक का लेखक कौन है, उस लेखक से क्या सम्बन्ध है. जहाँ तक अनुराग से सम्बन्ध की बात है तो इस पर कभी बाद में, अभी हाल-फ़िलहाल उसकी पुस्तक ‘सागर से झील तक’ के बारे में.

अनुराग की यह पुस्तक उनकी सात यात्राओं कन्याकुमारी, बद्रीनाथ धाम, गुरुवायुर, पचमढ़ी, राष्ट्रीय राजमार्ग 43, शिमला, लेह आदि का वृतांत है. रस्किन बांड के एक वाक्य ‘सभी मनुष्य मेरे दोस्त हैं, मुझे सिर्फ उनसे मिलना है’ से प्रेरित अनुराग विश्व बंधुत्व की भावना कि ‘सभी स्थान मेरे जाने-पहचाने हैं, मुझे बस वहां जाना है’ के साथ यात्राओं पर निकल कर उनका अनुभव ही नहीं देते हैं वरन उनके साथ जानकारियों का अनुपम भंडार भी खोल देते हैं. पुस्तक में संकलित यात्राओं में उनकी पहली यात्रा जो गोवा होते हुए कन्याकुमारी तक पहुँचती है, ट्रेन के अनुभवों, दक्षिण भारत के रोमांच का अनुभव तो कराती ही है साथ में जानकारियों से भी भर देती है. कोंकण रेलवे अपने निर्माण से लेकर अद्यतन लगातार रोमांच का विषय बना रहा है. इस सफ़र ने न केवल देशवासियों को वरन विदेशियों को भी अपनी तरफ आकर्षित किया है. इस यात्रा विवरण की विशेषता यही है कि जितनी जानकारी अनुराग गोवा के खुलेपन की देते हैं, कन्याकुमारी के बारे में देते हैं उससे कहीं अधिक जानकारी वे कोंकण रेलवे के बारे में देते हैं. निश्चित ही ऐसी जानकारी यात्रा के रोमांच को बढ़ाती है और ज्ञान में भी वृद्धि करती है. उनका रेल वृतांत जहाँ आगे की यात्रा के बारे में कौतूहल जगाता है वहीं क्रूज की सैर सागर से परिचय करवाता है.

ऐसा वे मात्र इसी यात्रा संस्मरण में नहीं करते हैं वरन लगभग सभी यात्रा-विवरणों में उनके द्वारा सम्बंधित क्षेत्र की, वहां की जीवन-शैली से सम्बंधित जानकारी प्रदान करने का प्रयास किया गया है. इसे लेह-यात्रा के संस्मरण में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है जबकि समुद्र तल से अधिक ऊँचाई पर होने के कारण होने वाली समस्या और उससे निपटने के लिए उपयोग की जाने वाली दवाई तक का जिक्र वे करते हैं. राष्ट्रीय राजमार्ग 43 की यात्रा के दौरान गुफाओं की खोज, उससे सम्बंधित पौराणिक कथाओं आदि का चित्रण लेखक के सजग मष्तिष्क की पहचान कराता है.

अनुराग के इस यात्रा-वृतांत की एक विशेष बात उन सभी को अवश्य ही आकर्षित करेगी जो उनसे परिचित हैं. उनके साथ बातचीत में शामिल होते हैं. उनके बात करने का अंदाज, उनकी शैली, शब्दों और वाक्यों का संयोजन जिस तरह से वे अपने रोजमर्रा के जीवन में करते हैं, उसी अंदाज में वे अपनी यात्रा के अनुभव पाठकों से साझा करते हैं. पूरी पुस्तक के पढ़ने के दौरान कहीं भी यात्रा विवरण पढ़ने जैसा एहसास नहीं होता है. ऐसा लगता रहता है जैसे अनुराग स्वयं सामने बैठकर अपनी यात्रा के बारे में बता रहे हैं. किसी भी स्थान पर कैसे पहुँचना हुआ, कैसे वहाँ के होटल में रुकना हुआ, कहाँ-कहाँ, कैसे-कैसे टहलना-घूमना हुआ इसका विवरण किसी भी तरह की साहित्यिकता के बोझ से लदा हुआ नहीं दिखाई देता है. शब्दों का सामान्य सा, दैनिक बोलचाल जैसा संयोजन उनकी यात्रा से पाठकों को जोड़ता है. ट्रेन में सामान रखने की स्थिति हो, भोजन करने की बात हो, प्लेटफ़ॉर्म पर ट्रेन का इंतजार करना रहा हो, सफ़र में अनजान यात्रियों के साथ अपनत्व का भाव बनाना रहा हो, भ्रमण-स्थलों के बाजारों अथवा दर्शनीय स्थलों को देखना-घूमना रहा हो, स्थानीय शब्दावली का प्रयोग और उसका अर्थ आदि को अनुराग बड़े ही सहज भाव से बताते से चलते हैं. एक बात निसंकोच इन यात्राओं के सन्दर्भ में कही जा सकती है कि इस वृतांत को पढ़ने के बाद यदि इन जगहों की सैर करने कोई पाठक जाये तो उसे कठिनाई का अनुभव नहीं होगा. उसे सम्बंधित दर्शनीय स्थल पहले से देखे हुए प्रतीत होंगे.

आलोचनात्मक दृष्टि से हमें आकर्षित करने वाली एक बात और दिखाई दी वह ये कि अनुराग के द्वारा अपने यात्रा अनुभवों में कहीं-कहीं हिन्दी फीचर फिल्मों के दृश्यों के द्वारा पाठकों को वहां की स्थिति समझाने का प्रयास किया गया है. यह प्रयोग संभवतः अपने आपमें अनूठा, अद्भुत कहा जायेगा. ऐसा इसलिए भी क्योंकि युवा पीढ़ी जिस तरह से फिल्मों को आत्मसात करती हुई उनके दृश्यों का आनंद लेती है, उसके लिए इन उदाहरणों से यात्रा को समझना सहज हो सकता है. अनुराग ऐसा प्रयोग करने में इसलिए सफल दिखते हैं क्योंकि वे पत्रकारिता के क्षेत्र से भी जुड़े रहे हैं. वर्तमान की मानसिकता को परखते हुए उसकी नब्ज पर हाथ रखने की कला इसी का सुखद परिणाम है. यात्रा के दौरान वे इसी पत्रकारिता अनुभव के कारण बारीक और गहराई भरी नजर रखने में भी सफल रहे हैं. इससे भी पुस्तक को रोचकता के साथ जानकारीपरक बनाने में सहायता मिली है.

‘सागर से झील तक’ पुस्तक पढ़ने के हमारे अनुभव को भले ही आलोचनात्मक या समीक्षात्मक टिप्पणी कह दिया जाये मगर ऐसा है नहीं. यह पुस्तक पढ़ने का अनुभव ही है जो अनुराग के साथ यात्राओं में लिया जा रहा है. पुस्तक के पढ़ने के दौरान लगा कि यदि अनुराग ने इसे डायरी शैली में लिखा होता तो शायद और अधिक आकर्षक विवरण सामने आये होते. ऐसा महसूस हुआ कि यदि उनकी यात्रा का अनुभव तिथिवार होता तो और अधिक रुचिकर बन सकता था. ऐसा इसलिए क्योंकि अनुराग तो अपनी यात्रा के विश्राम-काल में रात्रि को नींद के आगोश में चले जाते रहे मगर एक पाठक उनकी यात्रा में तारतम्यता के साथ विश्राम भी न कर सका. निश्चित रूप से आज के तकनीकी युग में जहाँ लोगों के पढ़ने के शौक कंप्यूटर, मोबाइल, किंडल पर विकसित हो गए हैं, बड़े-बड़े लेखों के स्थान पर छोटे-छोटे लेखों को वरीयता दी जाने लगी हो तब एक यात्रा का विस्तारपरक विवरण बहुत गंभीरता से शायद सभी लोग न पढ़ सकें. यदि ऐसी स्थिति किसी भी पाठक के साथ बनती है तो वह यात्रा संस्मरण के बीच संजोई गई गंभीर और ज्ञानवर्धक जानकारी से वंचित रह जायेगा. अनुराग को अपने यात्रा अनुभवों के साथ दी गई जानकारी के विस्तार के लिए उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटना ज्यादा समीचीन समझ आया.

इसके साथ-साथ सभी यात्राओं में विवरण की सार्थक और सकारात्मक जानकारी मिली मगर वे कन्याकुमारी में ऐसा करने से बचते से नजर आये. इसके पीछे एक कारण संभवतः यह जान पड़ा जो उनकी इस यात्रा के शीर्षक में स्पष्ट किया गया था. ‘दतिया से कन्याकुमारी वाया गोवा’ (रेलयात्रा वृतांत) शीर्षक से अपनी इस यात्रा को संजोने में अनुराग ने कई जगह विस्तार लिया मगर कन्याकुमारी में ऐसा नहीं किया. विवेकानन्द मेमोरियल, विवेकानन्द रॉक, तीन सागरों का मिलन-केंद्र, भारत के दक्षिणी सिरे का अंतिम बिंदु उनकी नज़रों से अचानक ही नहीं अछूता नहीं रह गया होगा. निश्चित ही इसके पीछे अनुराग की कोई न कोई कार्ययोजना रही होगी.

अनुराग की सागर से झील तक’ की यात्रा को महज यात्रा-वृतांत समझकर पढ़ने वालों को आरम्भ से ही पढ़ने के बजाय अनुराग के साथ भ्रमण करने जैसा आनंद मिलने लगेगा. यात्रा के दौरान की छोटी से छोटी घटनाओं को संकलित करते हुए वे अपनी यात्रा का अनुभव साझा नहीं कर रहे होते हैं बल्कि लगता है जैसे पाठकों के लिए भ्रमण का रूट-मैप निर्मित करते जा रहे हैं. ट्रेन संख्या, फ्लाइट संख्या, रेलवे स्टेशन, एअरपोर्ट, टैक्सी, होटल, छोटी-छोटी जगहों, चौराहों, बाजारों, कस्बों, खाद्य-सामग्रियों आदि के नाम सहित वर्णन नितांत उनके अनुभव बनकर ही नहीं रह जाते. उनकी परिजनों सहित यात्रा का आँखों देखा हाल भले ही उनकी थाती हो मगर निसंकोच कहा जा सकता है कि ‘सागर से झील तक’ पाठकों के लिए संग्रहणीय है, बिना यात्रा पर गए यात्रा का आनंद लेने का सुख है.


समीक्षक : डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
+++++++++++++++++++++++++
कृति : सागर से झील तक (यात्रा-वृतांत)
लेखक : अनुराग ढेंगुला
प्रकाशक : नमन प्रकाशन, नई दिल्ली
संस्करण : प्रथम, 2019
ISBN : 978-81-8129-866-9