मंगलवार, 1 मार्च 2011

गहन पीड़ा की उपज - इस कहानी का अंत नहीं -- (समीक्षा -- देवी नागरानी)

गहन पीड़ा की उपज - इस कहानी का अंत नहीं

जिज्ञासा को जन्म देने वाली बेचैनी मुझे पुस्तक के पन्ने पलटने के लिये मजबूर करती रही, उंगलियों की हरकत जारी रही, रुकी तब, जब सोच शिथिल हुई और ठिठकी, नीचे पहली पंक्ति पर नज़र पड़ते ही.... "एक कागज के टुकड़े से कहानी बनी"....सोचती रही , यह कैसा बेजोड़ जोड़ है। कागज़ के टुकड़े से कहानी बनी का क्या मतलब..... पर जब पढ़ती रही तो लगा कि जो कहानी निरंतर प्रवाहित होने के लिये सक्रिय रहती है और समग्र रूप से जीवन से जुड़ती है , वही शायद कहानी है, वही उसका श्रोत भी।

मानव मन वैसे भी लेखिनी की हर विधा का सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि होता है, जहाँ भावनात्मक ऊर्जा निरंतर मंथनोपरांत प्रवहमान होती रहती है। कहानी में लेखक अपने रचनात्मक संसार में विलीन हो जाता है, अपने पात्रों के साथ उठता-बैठता है, उन्हीं की तरह सोचता है , सक्रिय रहता है और यहीं आकर कल्पना यथार्थ का रूप धारण करती है। जी हाँ, वह जिज्ञासा को जन्म देनेवाला कहानी संग्रह "इस कहानी का अंत नहीं" है , जिसकी रचनाकार जानी-मानी प्रवासी कथाकार इला प्रसाद हैं जो अपनी ही सोच के तानों-बानॊं से उलझती हुई, प्रसव की गहन पीड़ा को महसूस करते हुए , इस पुस्तक की भूमिका में लिखती हैं- "इस संग्रह की एक- एक कहानी के पीछे , वर्षों की भोगी हुई पीड़ा ,घुटन और विवश क्रोध है, जो मुझे लगातार अन्दर ही अन्दर गलाते रहे हैं।" सोचती हूँ, जिन्दगी की ऐसी कौन सी कशमकश होगी जो ज्वालामुखी की तरह विस्फ़ोटित होने को आतुर है, ऐसा कौन सा तान्डव जीवन में आया होगा जो यह मानव मन मंथन के उपरांत अपने भाव क़लम के माध्यम से काग़ज़ पर उतार लेता है। पढ़ते-पढ़ते यह जाना कि इला जी की कहानियों की भूमिकायें रोजमर्रा जीवन की सच्चाइयों से ओत-प्रोत हैं।

उनकी कहानी "जीत" पढ़ते हुए पाया कि नारी मन का मनोबल रेत के टीले की तरह ढह जाता है। चुनौती देने वाले नौजवान छात्र दुश्मनी निभाने की चुनौती अपनी एक्ज़ामिनर मिसेज़ सिन्हा को देते हैं , तदुपरान्त नारी मन का यंत्रवत, सन्नाटे के घेराव में, अपने आप को अपराधी महसूस करते हुये स्थानीय अख़बार के दफ़्तर में लिखित बयान देना और अगले दिन तक एक ख़बर का बन जाना ज़ाहिर था। शायद नारी मन इसमें भी अपनी जीत देख रहा है , जीत और जीत के नशे का रंग भी कितना निराला है!

इलाजी की और अनेक कहानियाँ आज के वातावरण से जुड़ी हैं- मेल , रोड टेस्ट , ग्रीन कार्ड , सेल , कालेज - जिनका अब इस ज़माने में हर पाठक के साथ परिचय जरूरी है। भुमंडलीकरण के साथ तक़नीकी इज़ाफ़ा हुआ है और इंटरनेट के साथ जुड़कर मेल तक पहुँचे हैं हम। परन्तु इन सब विषयॊं पर एक आम इन्सान के नज़रिये से रोशनी डालना, अपनी विविधता, संकल्पशीलता और प्रस्तुतीकरण को एक सशक्तता प्रदान करना इला जी की खासियत है। "खिड़की" एक ऐसी ही कहानी है, नारी मन की पीड़ा, घुटन और अन्तर्द्वद का दस्तावेज है यह कहानी।

ज़िन्दगी की संकरी पगडंडियों से गुजरते हुये , इलाजी की कहानियों के क़िरदार उन लम्हात से रूबरू कराते हैं, जहाँ ख़ामोशियाँ भी शोर मचाती हैं. शहर के जीवन में अक्सर देखा जाता है कि बेपनाह सुविधाओं के बीच जहाँ कई सुख के साधन, धन दौलत मन चाही मुरादों को पूरा करने में मददगार साबित होते हैं , वही जाने क्यों और कैसे आम आदमी के दिल के किसी कोने में खालीपन का अहसास भर देता है और जब तक वह क़ायम रहता है , इन्सान अनबुझी प्यास लेकर जीवन के सहरा में भटकता है, तड़पता है।

"ग्रीन कार्ड" कहानी में हक़ीक़तों को दर्शाया गया है। परदेस से आनेवाला राजकुमार अपनी पसंदीदा, वतन की लड़की से नाता जोड़कर चला जाता है। कुछ वादे करके , कुछ वीज़ा के हवाले देकर और फ़िर देखते ही देखते दिन, हफ़्ते, महीने और फ़िर साल हाथ से रेत की तरह फ़िसलते चले जाते हैं। रिश्तों की शिला भरभरा जाती है। रिश्ते तो बुने जाते हैं पसीने के तिनकों से, अहसासों के तिनको से, सम्बन्धों की महत्त्व से, तब कहीं जाकर अपनत्व की वो चादर उस रिश्ते को सुख-दुख की धूप-छाँव में, बारिश, आँधी, तूफ़ान में महफ़ूज रखती है। रिश्ते निबाह- निर्वाह की नींव पर मान्यता हासिल करते हैं। भारत और विदेश की समस्याओं से गुज़रती एक नारी की कहानी है "ग्रीन कार्ड" जो चाह्कर भी अपनी नकारात्मक सोच से रिहाई नहीं पा रही। बेहद अपमान जनक स्थितियों के कारण उसके अन्दर का अँधेरा घना होता जा रहा है। उसका अन्तर्द्वद्व इस कहानी में बखूबी चित्रित हुआ है और पाठक उसे अपने रोज़मर्रा के जीवन में महसूस सकता है।

जीवन में कई ऐसे मोड़ आते हैं जो ज़िंदगी को नई माइने बख़्शते हैं. परस्पर दो प्राणियों की मुलाक़ात, उनकी गुफ़्तार और फिर सिलसिले धीरे धीरे यादों को गहरा कर देती हैं. इला जी ने अपनी क़लम के सहारे कई ऐसे पारदर्शी सम्बन्धों की कहानी अपनी स्मृति के गलियारे से मुक्त कर हमारे साथ बाँटी है। ये कहानियाँ कहीं कहीं संस्मरण, कहीं आधुनिकीकरण की दशा और दिशा से हमारा परिचय कराती हुई महसूस होती हैं। उन्हें इस संग्रह के लिये मेरी दिली शुभकामनायें हैं और उम्मीद ही नहीं यक़ीन है कि जीवन से जोड़ते हुये इस कहानी संग्रह को पाठकों का स्वागत और स्वीकृति मिलेगी।

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समीक्षकः देवी नागरानी,

डी, कार्नर व्यू सोसाइटी,

बांद्रा, मुंबई ४०००५०.

कहानी संग्रहः इस कहानी का अंत नहीं,

लेखिकाः इला प्रसाद,

पन्ने=९६,

मूल्य=रु॰ १२५,

प्रकाशकः जनवाणी प्रकाशन, विश्वास नगर, दिल्ली ११००३२


रविवार, 6 फ़रवरी 2011

वर्तमान सम्बन्धों के विघटन का जीवंत यथार्थ

वर्तमान सम्बन्धों के विघटन का जीवंत यथार्थ
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वस्तुतः अतीत सदैव वर्तमान पर अपने प्रहार करता रहता है। यह तो उस व्यक्ति-विशेष पर आधारित होता है कि वह कितना उसे सह पाता है या प्रेरणा लेकर भविष्य का वाङ्मय रचता है। परम्परा से चली आ रही विकृतियों को समकालीन नजरिये से अवलोकन करने का जो वैचारिक औदार्य एवं सैद्धान्तिक अडिगता डॉ. वीरेन्द्र यादव के साहित्य में है। डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव की सद्यः प्रकाशित पुस्तक मोहन राकेश की रचनाओं में पारिवारिक सम्बन्धों की त्रासदी में वर्तमान समय की पारिवारिक विसंगतियों का जीवन्त वर्णन किया गया है। चार अध्यायों में विभाजित मोहन राकेश की सभी रचनाओं, कहानी, उपन्यास, नाटक एवं संस्मरणों को युवा विद्वान लेखन ने आधुनिक नजरिये से रेखांकित करने की कोशिश की है। आपका मोहन राकेश के बारे में मानना है कि मोहन राकेश की रचनाओं में परिवार का परम्परागत ढाँचा छिन्न-भिन्न सा हो गया है। स्त्री-पुरुष का निजीपन मानों आज की भीड़ में (विशेषकर महानगरों में) कहीं खो सा गया है उसे सबके बीच में जीते-जीते भी उफ, उदासी और आत्मीयहीन अपरिचय के साथ जीना पड़ रहा है। वर्तमान की वास्तविकता भी यही है कि आज स्त्री-पुरुष अपने जीवन में कई समस्याओं के बीच फंस गये हैं। दोनों मन ही मन कई समस्याओं में उलझे हुए है। कल्पनाएं यथार्थ के ताप में जलकर झुलस गई हैं, विवाह हुआ पर नौकरी नहीं, नौकरी मिली तो सन्तोषप्रद नहीं और जीवन की इच्छापूर्ण बन सके इतनी आय वाली नहीं, बोझ ढोते चल रहे हों वैसा महसूस होता है। पुरुष-पत्नी की खोज में भीतर ही घुलता जा रहा है, स्त्री भी बार-बार सहते-सहते विद्रोही तेवर अख्तियार करने पर उतारू हो गई है ।दोनों का मनद्विधाग्रस्त हो गया है अतीत इससे अच्छा था,वे अतीत में जाना चाहते हैं वे बहुत कुछ सोचतें हैं पर कुछ कर नहीं सकतें हैं आखिर विवश भाव से सभी.परिस्थितियां को आज के दम्पत्ति झेल रहें हैं किसी के जीवन में आनन्द नहीं,उत्साह नहीं बस है तो टूटन,विवशता,ऊब तथा निराशा ,जिसमें वह म नही मन डूबता-उतराता रहता है -स्त्री पुरूष के सम्बन्धें की यह स्थितिऔर पूरी कचोट भरी वेदना के साथ आज की रचनाओं में आकार पा रही है। जीवन की विसंगतियों से उपजा यह पीड़ा बोध न केवल मोहन राकेश की रचनायों का विषय है वरन् समूची पीढ़ी द्वारा चित्रित कथा साहित्य का अनिवार्य सोपान भी हैं।आचार्य तुलसी ने लिखा है कि -‘लेखनी और वाणी ये दो बड़ी शक्तियां हैं जिनके द्वारा व्यक्ति-लोक जीवन में प्रवेश करता है, उस पर प्रभाव छोड़ता है और उस युग की सभ्यता एवं संस्कृति को अपने अस्तित्व से अनुप्राणित कर देता है। लेखनी और वाणी दोनों बहने हैं, दोनों का अपने-अपने स्थान पर पूरा मूल्य है क्योंकि उसके कंधे पर सवार होकर ही मनुष्य का चिंतन सम्पादित होता है।’’ और ये दोनों बहने डॉ. वीरेन्द्र यादव जैसे योग्य पात्र के साथ संयुक्त होकर कृत-कृत्य हैं।

लेखक का मानना है कि मोहन राकेश समकालीन कथाकारों में अन्यतम हैं। आपने हिन्दी कथा को आडम्बर, कृत्रिमता, सस्ती भावुकता और जुमले से अलग करके एक आत्मीय रिश्ता प्रदान किया। यही कारण है कि मोहन राकेश के कथा साहित्य में संवेदना की आधुनिकता है, अनुभव का खरापन है और सम्प्रेषण का यथार्थ आधार है। मोहन राकेश की रचनाओं विशेषकर कहानी, उपन्यास और नाटकों में अधिकतर पारिवारिक विघटन के बीच आर्थिक सम्बन्धों की त्रासदी के अनेक कारण स्पष्ट तौर पर देखे जा सकते है, जिनमें व्यक्तिगत सम्बन्धों का अहम ,आर्थिक कारण, मानवीयता एवं मूल्यों के पतन के कारण, समकालीन भ्रष्टाचार के साथ विभाजन की त्रासदी के कारण भी पारिवारिक सम्बन्धों में खटास उत्पन्न हो रही है। पारिवारिक विघटन की प्रमुख रचनाओं में एक और जिन्दगी, गुंझल, सुहागिनें (कहानी) अंधेरे बंद कमरे, न आने वाला कल, अन्तराल (उपन्यास) तथा नाटकों में आधे-अधूूरे, आषाढ़ का एक दिन एवं लहरों के राजहंस में विशेष रूप से देखने को मिलता है। यहाँ पुस्तक के अवलोकन से मैं यह कहना चाहूँगा कि वर्तमान युग जीवन में टूटते मानवीय सम्बन्धों और मूल्यों के फलस्वरूप व्यक्ति के आन्तरिक विघटन के सूक्ष्मातिसूक्ष्म पक्षों को भी स्वर देने का प्रयत्न किया गया है जो वर्तमान परिवेश की विसंगतियों से उद्भूत युग सत्य है।

डॉ. वीरेन्द्र यादव प्रस्तुत पुस्तक में यह स्पष्ट करते हैं कि मोहन राकेश के उपन्यास और कहानी का सफर सचमुच डिप्रेसिंग है, क्योंकि लेखक जो प्रश्न उठाता है, उसका उत्तर दुनिया से नहीं अपने आपसे मांगना होता है और इस मुकाम पर हम अपने ही सामने निर्वस्त्र होने को विवश होते हैं, वरना उन समस्याओं का अवसर मिल ही नहीं सकता है। मानवीय सम्बन्धों को एक नयी दृष्टि और हृदय की अटल गहराई को कुरेदने वाले राकेश जी ने जिंदगी भर मानवीय सम्बन्धों पर विचार किया क्योंकि उनकी मान्यताएं पुरानी लीक छोड़कर समाज को देखने की एक नवीन दृष्टि रखती थी। प्रस्तुत पुस्तक शोधार्थियों, अध्येयताओं एवं प्राध्यापकों के लिये उपयोगी होगी ऐसी मेरी मान्यता है।

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समीक्षक - डॉ दिव्या माथुर
पुस्तक - मोहन राकेश की रचनाओं में पारिवारिक सम्बन्धों की त्रासदी
लेखक - डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - नमन पब्लिकेशन्स,4231/1अंसारी रोड ,दरियागंज,नई दिल्ली-110002
मूल्य - रु. 400.00
पृष्ठ - 22+186=208
ISBN - 979.86129.237.5

गुरुवार, 27 जनवरी 2011

नई सहस्त्राब्दी में-मानवाधिकार के विविध सन्दर्भ


नई सहस्त्राब्दी में-मानवाधिकार के विविध सन्दर्भ
(संपादक-डा0वीरेन्द्र सिंह यादव)
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मनुष्य सर्वोष्कृष्ट प्राणी है। मनुष्यता उसके जीवन का आध्यात्मिक एवं लौकिक अलंकृण है। प्रत्येक मनुष्य का मनुष्य के साथ सभाभाव मनुष्यता की मांग है। अतः जाति, लिंग, धर्म, सम्प्रदाय या वर्ग से परे सभी को सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक दृष्टिकोण से सम्मानपूर्वक जीवन जीने का पूर्ण अधिकार ही मानवाधिकार है। इक्कीसवीं सदी उत्तर आधुनिक मानव की सदी है, आज का मानव तमाम वर्जनाओ, बन्धनों को तोड़ आगे बढ़ने को तत्पर है, अतःसब के लिए सब’, जियो और जीने दो के भाव के साथ मनुष्य अपने अधिकार प्राप्ति हेतु संचेतित हो प्रखर मुखर हो रहा है। मनुष्य की बौद्धिकता मानवीय विचारधारा के प्रतिफल स्वरूप ही 10 दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारामानवाधिकार आयोगकी सार्वभौमिक घोषणा की गई। वैश्वीकरण के इस युग मेंमानवाधिकार आयोगकी भूमिका के वैज्ञानिक मूल्यांकन हेतु डा0वीरेन्द्र सिंह यादव के द्वारा नई सहस्त्राब्दी में- मानवाधिकार के विविध संदर्भपुस्तक का प्रकाशन एक सराहनीय प्रयास है।

नई सहस्त्राब्दी के परिवर्तित परिवेश में मानवाधिकार के वैश्विक प्रभाव, उसके स्वरूप उद्देश्य, लक्ष्यों परिणामों को साहित्यकार वीरेन्द्र सिंह यादव ने विभिन्न मनीषियों, बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों के सहयोग से मानवाधिकार का सूक्ष्म वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करने का सार्थक प्रयास किया है। लगभग 33 शोध पत्रों के माध्यम से लेखक ने मानवाधिकार के प्रत्येक पक्ष को अत्यन्त तत्थपरक दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर वैज्ञानिक ज्ञान का अप्रितम उदाहरण प्रस्तुत किया है। वैश्वीकरण को मददेनजर रखते हुए समग्र विश्व में मानवाधिकार की विवेचना के साथ-साथ भारत में इसकी उपादेयता को महसूस करते हुए भारतीय संदर्भ में भी वैज्ञानिकों ने इसका विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है। डा0 अजय सिंह का शोध पत्र मानवाधिकार एक अवधारणात्मक विश्लेषण मानवाधिकार की तथ्यपरक व्याख्या प्रस्तुत करता है।’ ’मानवाधिकार की समस्याएं और संरक्षण, भारतीय परिदृश्य में भारत में मानवाधिकार आयोग की स्थिति की सार्थक विवेचना प्रस्तुत करता है। इसी प्रकार महिलाओं के सबलीकरण सशक्तीकरण एवं उनकी विभिन्न समस्याओं के निदान में मानवाधिकार की भूमिका को अत्यन्त महत्वपूर्ण समाज वैज्ञानिक संदर्भ में प्रस्तुत कया गया है।

यह सर्वविदित है कि नई सहस्त्राब्दी में मानवाधिकार आयोग की अग्रणी भूमिका ने मानवीय विकास की सार्थक जमीन तलाश की है, आज भारत में ही नही समग्र विश्व में जाति, वर्ग, नस्लीय भेद, लौंगिक विभेद की खाई को पाटने में मानवाधिकार अपनी महती भूमिका का निर्वहन करता आया है। इसी सब मुद्दो को अद्वितीय साहित्यकार डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव ने अति प्रासंगिकता के साथ सूक्ष्म दृष्टि से पुस्तक का सम्पादन किया है। वैज्ञानिक एवं तर्क संगत विचाराधारा इस पुस्तक की सर्वोत्तम उपलब्धि है जो समाज विज्ञान के प्रत्येक शोधार्थी, विधार्थी के लिए अति उपयोगी सिद्ध होगी।

डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव वर्तमान युवा साहित्यकार के रूप में अनेक पुरस्कारों अंलकृणों के साथ अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हैं। डा0 यादव की विशेषता यह है कि मात्र एक साहित्यकार के रूप में नहीं अपितु विशिष्ट वैज्ञानिक परख के साथ वे समाज के प्रत्येक क्षेत्र से संबंधित पुस्तकों सम्पादन कर अपनी विलक्षण प्रतिभा का प्रमाण प्रस्तुत कर चुके हैं। दुआओं के साथ आशा है कि वे साहित्य एवं समाज विज्ञान के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप बनाये रखने में सदैव अग्रणी रहेंगें।

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समीक्षक - डा0 सबीहा रहमानी
असिसटेंट प्रोफेसर-समाजशास्त्र
रा00स्ना0महा0,बांदा
एवम्
अवैतनिक प्रबंधक
चिराग फाउण्डेशन(चैरिटबल संस्था) बांदा

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पुस्तक - नई सहस्त्राब्दी में मानवाधिकार के विविध सन्दर्भ
सम्पादक - डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव
प्रकाशक - ओमेगा पब्लिकेशन्स 4373/4 बी., जी. 4,
जे. एम. डी. हाउस, मुरारी लाल स्ट्रीट,
अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य - रु0 795.00
पेज - 24 + 304 = 328
ISBN - 978-81-8455-257-7

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

स्मृतियों के उपवन की मधुर सैर है "कितने अपने"

    मनुष्य कितना ही विकास क्यों न कर ले किन्तु वह स्वयं को स्मृतियों से मुक्त नहीं कर पाता है। पता नहीं यह मोहपाश है अथवा बीते पलों को न भुला पाने की विवशता कि व्यक्ति जाने-अनजाने ही स्मृतियों के विशाल उपवन में विचरण करने लगता है। सुखद पलों की सोंधी महक एसे भटकाती है तो दुःखद पलों के काँटों की चुभन एक टीस पैदा करती है। डॉ0 वीणा श्रीवास्तव की स्मृतियों का उपवन उन्हें भी कभी महकाता है तो कभी एक टीस सी देता दिखता है। इन स्मृतियों का वे आज जिस तरह स्वयं अनुभव करतीं हैं वही अनुभव ‘कितने अपने’ के द्वारा अपने पाठकों को भी करवातीं हैं।

    ‘अब वो मिठास कहाँ’ से शुरू उनकी स्मृति-यात्रा पैंतीस सोपानों से गुजरते हुए अन्त में वर्तमान में खड़ा करती है। इस पूरी स्मृति-यात्रा में हर पल यही अनुभव होता रहा कि हाँ, ऐसा तो कुछ मेरे साथ भी हुआ है। ‘कितने अपने’ का आरम्भ ही समूची स्मृतियों का सूत्र-वाक्य लगता है कि ‘उस गुठली या फाँकों में जो मिठास थी वो अब किलो भर आम या पूरे खरबूजे में कहाँ? वो मिठास तो संतुष्टि की थी, आम या खरबूजे की नहीं।’
 
    बचपन की स्मृतियों में ले जाती लेखिका तत्कालीन समाज का चित्र भी अनायास हमारे सामने खींच ले जाती हैं। ‘कमथान साहब’ ‘बटेश्वरी चाचा’ ‘बहर साहब’ के लबों से गुजरता ‘हुक्का’ बाबू जी के मुँह पर रुकता तो वह मात्र विषयों की चर्चा, किसी निर्णय, पारिवारिक मसलों का आधार नहीं बनता वरन् तत्कालीन सामुदायिकता का परिचायक भी बनता है। संयुक्त परिवारों की दृढ़ता के साथ-साथ सामाजिक सम्बन्धों को भी पुष्ट करता दिखता है। ऐसी सामुदायिक भावना के मध्य ही लेखिका ‘परमट वाली बहू’ ‘चुन्नीगंज वाली महाराजिन’ तथा ‘रामानुज चाचा’ के गुम हुए चेहरों को खोजती है, जो परिवार के सदस्य न होकर भी एक पारिवारिक सदस्य की भाँति आदर और सम्मान के पात्र रहे। ‘जहाँ देखो वहाँ मुखौटे ही मुखौटे हैं। चलो ढूँढती हूँ इन्हीं मुखौटों में शायद कुछ लोग ऐसे मिल जायें जिन्हें मैं कह सकूँ ये ‘कितने अपने’ हैं, की एक टीस के बीच लेखिका पुराने सम्बन्धों का आधार तलाशने का प्रयास भी करती हैं।
 
    लेखिका डॉ0 वीणा श्रीवास्तव का संगीत के साथ-साथ साहित्य से भी जुड़ा होना उन्हें अत्यधिक सम्वेदनशील बनाता है। यही कारण है कि वर्तमान कालखण्ड से कहीं बहुत दूर किसी समय में जब वे स्वयं बचपन की शरारत, मासूमियत, निश्छलता को जी रही थीं, उन्हें उस समय की कुछ किरिचें आज भी चुभती हैं। इसी चुभन के बीच वे पारिवारिक संरचना की मिठास को खोजती हुई तुरन्त ही ‘पीपल की शादी’ ‘वह तोड़ती ईंट’ जैसी मनोवैज्ञानिक वेदना को भी प्रदर्शित करती हैं।
 
    ‘रंगपासी’ के माध्यम से आँगन में खड़ी दीवार की टीस, विभा का ‘प्रेमघट, रीता का रीता’ रह जाना, ‘मुनिया’ का पिंजड़े में बद्ध जीवन, शोभा के प्रति डॉक्टर की ‘अमानुष’ होने की वेदना को गहराई से प्रकट करना लेखिका के सम्वेदनशील होने का प्रमाण है। इसी सम्वेदनशीलता के कारण वे बचपन की ‘पतंग’ को न उड़ा पाने की विवशता को याद रख पाती हैं तो छोटी सी चवन्नी के सहारे बालसुलभ प्रतिद्वन्द्विता के रूप में अपनी सहेलियों को प्रत्युत्तर भी देती हैं तथा खुद को क्षणिक अमीर बने होने का भाव भी हृदय में सहेजे रह पाती हैं।
 
    परिवार, रिश्ते, नाते, सम्बन्धियों, दोस्तों, सहेलियों के आत्मीय व्यवहार को अपनी सुखद स्मृतियों में सँजोये लेखिका प्रकृति प्रेम को भी आत्मीय रूप में अपने में समाहित किये हैं। तभी उन्हें खजुराहो की कलाकृतियों में, मंदिरों में एक प्रकार का दर्शन दिखता है तो हिमालय की चोटियों, पर्वत श्रेणियों, झीलों, जलप्रपातों में मानवीय गुणों को देख उनका मन मंत्रमुग्ध हो उठता है। सम्वेदनशील हृदय की मलिका होने के कारण यदि वे अपनी ‘बिटिया’ के प्रति संवेदित हैं तो नन्हे से खरगोश चीकू के प्रति भी असंवेदनशील नहीं होती हैं। इसी स्वच्छ और निर्मल चित्त होने के कारण उन्हें और उनके पूरे परिवार को नारियल में माँ दुर्गा के साक्षात दर्शन प्राप्त होते हैं।
 
    ‘कितने अपने’ की लेखिका डॉ0 वीणा श्रीवास्तव का लगाव संगीत से बचपन से ही रहा है। ‘गुरु कृपा’ से वे आज इसी क्षेत्र में अध्यापन कार्य से जुड़ी हैं। संगीत की लय, तालबद्धता, उतार-चढ़ाव उनके स्मृति-लेखन में भी दिखाई देता है। एक-एक संस्मरण जैसे उनके मन-मष्तिष्क से कागज पर सीधे उतर आया हो। बिना किसी कृत्रिमता के, बिना किसी साहित्यिकता के शब्दों में संगीत की लहरियाँ दिखती हैं, रेखाचित्र सी चित्रात्मकता है तो शब्दों का नैसर्गिक प्रवाह। गीतों की रवानी सी इस पूरे संकलन ‘कितने अपने’ में देखने को मिलती है। बचपन की बात करते-करते अपने परिवार को याद करना, परिवार को याद करते-करते प्रकृति की गोद में चले जाना, प्रकृति की मनमोहक छवि के बीच अपने किसी प्रिय की परेशानी याद करने लगना और इन सबके बीच फिर से बचपन की किसी घटना का स्मरण करने लगना दर्शाता है कि लेखिका ने किसी प्रयास रूप में स्मृतियों का उपवन तैयार नहीं किया है वरन् स्मृतियों का जो स्वरूप मन-मष्तिष्क में उभरता रहा वही ‘कितने अपने’ के रूप में सामने आया। 
 
    बिना प्रयास के स्वतः स्फूर्त रूप से उभरती स्मृतियों के मध्य कुछ कमी सी लगती है। ऐसा शायद उन्हें न लगे जो लेखिका से परिचित नहीं हैं पर जो डॉ0 वीणा जी के सम्पर्क में हैं वे आसानी से उस कमी को देख सकते हैं। यह मेरा सौभाग्य है कि लेखिका का वरद् हस्त मेरे ऊपर भी है। पिछले कई वर्षों का आत्मीय, पारिवारिक सम्पर्क होने से यह कमी मुझे भी दिखी। स्मृतियों के इस उपवन में उनके छोटे भाई संदीप की महक नहीं दिखती है, उनकी अन्य बहिनों की अंतरंगता परिलक्षित नहीं हुई है, उनके जीवनसाथी डॉ0 अरुण कुमार श्रीवास्तव के सहयोग और प्रेम की विश्वासधारा भी नहीं दिखी, जो महाविद्यालय एक लम्बे अरसे से लेखिका की विविध गौरवमयी उपलब्धियों का मूक दर्शक रहा है उसकी चमक इन स्मृतियों में प्रकाशित नहीं हो सकी। ये स्थितियाँ भी दर्शाती हैं कि लेखिका ने स्मृतियों को सँजोने का जो प्रयास किया है उसको शब्दरूप नहीं दिया है वरन् वे स्वतः, स्वच्छन्द रूप से निर्मित होकर ‘कितने अपने’ के रूप में सामने आईं हैं।
 
    हाँ, इसके साथ यह भी हो सकता है कि जिन स्मृतियों की सुगंध की कमी दिखती है, लेखिका उन कुछ स्मृतियों को अपनी थाती के रूप में सहेज कर उस उपवन में नितान्त निजी रूप में स्वयं ही विचरण करना चाहती हों, उनका अकल्पनीय सुख वे स्वयं ही भोगना चाहती हों।
 
    कुछ भी हो ‘कितने अपने’ के बाद भी अभी और बहुत से कितने अपने शेष हैं जिनसे मिलने को पाठकगण आतुर हैं। आशा है कि डॉ0 वीणा श्रीवास्तव अपने स्मृति-उपवन की सैर आगे भी हम सभी को करवाती रहेंगीं।
 
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कृति-कितने अपने (स्मृतियाँ)
रचनाकार-डॉ0 वीणा श्रीवास्तव
प्रकाशक-नमन प्रकाशन, नई दिल्ली
पृष्ठ-101
मूल्य-रु0 150.00 मात्र
समीक्षक-डॉ0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

लौ दर्दे दिल की -- देवी नागरानी (ग़ज़ल संग्रह) की समीक्षा

लौ, जो रौशनी बन गयी

ग़ज़ल ने हिंदी साहित्य मे अपना विशिस्ट स्थान बना लिया है यही कर्ण है की हिन्दी काव्य मे हर तीसरा कवि ग़ज़ल विधा मे अपनी अभिव्यक्ति कर रहा है | दुष्यन्त से लेकर आज तक हजारों गज़लकार ने राष्ट्र और समाज के ज्वलंत विषयों पर अपनी अपनी गज़लों मे चर्चा की है | आधुनिक गज़लकारो में देवी नागरानी का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है जिन्होंने राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी गज़लों से विशेष स्थान बनाया है | उनका नवीनतम ग़ज़ल संग्रह लो दर्द-दिल की इस बात का पक्का सबूत है कि ग़ज़ल अपने कथ्य और शिक्षा से पूरे मानक -समाज मे प्रेम और सदभाव का सन्देश दे रही है यथा -

मुहब्बत के बहते हों धारे जहाँ

वतन ऐसा जन्नत -निशाँ चाहिए

ग़ज़ल कि सार्थकता पर उनकी पंक्तियाँ हाटव्य है -

अनबुझी प्यास रूह कि है ग़ज़ल

खुश्क होठों कि तिशनगी है ग़ज़ल

बचपन कि खुशियों को धर्म-जाति और आंतकवाद के नाग ने डस लिया है | देवी नागरानी के शब्दों मे -

अब तो बंदूके खिलौने बन गई

हों गया वीरान बचपन का चमन

कवयित्री ने गज़लों मे हिन्दी -उर्दू के शब्दों का सुंदर व सटीक प्रयोग किया है जो उनके गहन भाषा ज्ञान का प्रतीक है | एक मतला देखे -

कर गई लौ दर्दे-दिल कि इस तरह रौशन जहाँ

कौंधती है बादलों में जिस तरह बर्के-तपाँ

कवयित्री का समर्थन नारी और गरीब आदमी के लिए है -

चूल्हा ठंडा पड़ा है जिस घर का

समझो ग़ुरबत का है वहां पहरा

नारी होती है मान घर-घर का

वो मकाँ को बनाये घर जैसा

ये पंक्तियाँ भी पाठक और श्रोता को गज़ब का हौसला देती है -

किसी को हौसला देना -दिलाना अच्छा लगता है

ज़रुरत मे किसी के काम आना अच्छा लगता है

देश पर अपनी जान लुटाने वालों को याद करते हुए वे कहती है -

मिटटी को इस वतन कि ,देकर लहू कि खुशबू

ममता का, क़र्ज़ सारा, वीरों ने ही उतरा

कुल मिलाकर देवी नागरानी की गज़लों है जीवन के सभी रंगों का सलीको और संजीदगी से सजाया है जो ग़ज़ल के बेहतर भविष्य का पता देती है| आशा है उनकी ये गज़ले देश- विदेश मे लोकप्रिय होंगी और अपना विशिष्ट स्थान बनाएगी| उन्हें बधाई|

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समीक्षक --

डॉ.रामगोपाल भारतीय

६ ए ब्रिज कुंज, रोहटा रोड , मेरठ (उ० प्र०) भारत. मो. (०९३१९६१८१६९)

संग्रहः लौ दर्देदिल की,

ळेखिकाः देवी नागरानी,

पन्नेः १२०, मूल्यः रु.१५०,

प्रकाशकः रचना प्रकाशन, मुंबई ५०



शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

प्रेम को चरितार्थ करती, अंधकार में दीप जलाती कथा - टेम्स की सरगम

संतोष श्रीवास्तव के उपन्यास --- टेम्स की सरगम की समीक्षा
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प्रेम को चरितार्थ करती, अंधकार में दीप जलाती कथा -
टेम्स की सरगम


समीक्षक
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सुमीता केशवा
2204 क्रिमसन टावर
आकुर्ली रोड, लोखंड्वाला
कांदिवली [ईस्ट] मुंबई






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वरिष्ठ कथा लेखिका संतोष श्रीवास्तव का सद्य प्रकाशित उपन्यास 'टेम्स की सरगम' प्रेम तत्व की स्थापना तक अपनी कृति को पहुंचाने की सार्थक पहल है। इसके पहले उनका उपन्यास 'मालवगढ़ की मालविका' पाठकों के ह्र्दय में अक्स होकर रह गया था। तीन स्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित इस उपन्यास के कुछ अंश 'मंगल पांडे' फ़िल्म में भी लिये गये थे। निश्चय ही उनका चौथा उपन्यास 'टेम्स की सरगम' भी पाठकों की अपेक्षाओं में खरा उतरेगा।

कथा आरंभ होती है भारत में अंग्रेजों के शासन के अंतिम चार दशकों के समय से जब ईस्ट इंडिया कंपनी के पदाधिकारी टाम ब्लेयर का जहाज भारतीय तट को छूता है। साथ में उसकी अत्यंत खूबसूरत,कमसिन,विदुषी और भावुक ह्रदय वाली पत्नी डायना भी है। कलकत्ते के अपने शानदार आवास में रहते हुए टाम एय्याशी का जीवन यह मानते हुए जीता है कि कालों पर तो केवल शासन किया जा सकता है जबकि डायना जो लंदन में अपने समृद्व व्यापारी पिता की एकमात्र संतान है भारतीय कला और साहित्य से विशेष लगाव रखती है। वह संगीत औए वाध कला में खुद भी पारंगत होना चाहती है। भारतीय साहित्य को अच्छी तरह समझने के लिए वह संस्कृत, हिन्दी और बांग्ला भाषाएं सीखती है। और साथ ही संगीत भी। टाम से निरंतर अवहेलना, दुर्व्यवहार पा उसका कोमल मन चीत्कार कर उठता है और वह अपने संगीत गुरु चंडीदास से प्यार कर बैठ्ती है। चंडीदास आकर्षक,युवा, बंगाली है जो स्वयं भी डायना की तरफ़ आकर्षित है। परस्पर अनुभूतियों और खिंचाव में बद्व दोनों ही एक दूसरे को ऐसा प्रेम करते हैं जो ईश्वरीय स्वरुप ले लेता है। लेखिका ने इस प्रेम को इतिहास में ऐसा गूंथा है कि उस समय का यथार्थ,रहन सहन,सामाजिक उथल पुथल आजादी के प्रति दीवानगी आदि बातें एक सूत्र की तरह जुड्ती़ जाती हैं। इतिहास को अर्थ तभी मिलेगा जब मनुष्य प्रेम के तत्व को पहचान कर उसे प्राप्त कर लेगा।

पूरे उपन्यास में कलकत्ते का जीवंत वर्णन है। उस जमाने बतौर शान इस्तेमाल की जाने वाली फ़िट्न, अंग्रेज हुक्मरानों की विशाल कोठियां और बगीचे के खूबसूरत पुकुर। ऐसे जीवंत माहौल में संगीत का रियाज होता है और डायना सीखती है भारतीय संगीत ।

टाम के स्त्री विषयक विचार एक पितृसत्तात्मक समाज को रचते हैं। ऐसे में नादिरा जैसे पात्रों के कथन....''ईसा मसीह कहते हैं औरतों और कोढ़ियों पर दया करो...यानी कि औरतों के अधिकारों को स्वेच्छा से या दया दिखाते हुए स्वीकार किया है पश्चिम के देशों में...बड़ा उपेक्षापूर्ण नजरिया है वहां। नारी विमर्श की अछूती पृष्ठभूमि तैयार करते हैं। आज जब विभिन्न नारी संगठनों द्वारा इस विषय पर काफ़ी कुछ चर्चा में है लेखिका ने सहज ही इसे उठाया है।

पूरे उपन्यास में इस तरह के वाकये हैं जो भले ही कथा के मूल विषय से परे हैं पर कथा सूत्र को आगे बढ़ाने में और कथा समय के यथार्थ को चित्रित करने में एक अलग ढंग का ट्रीटमेंट बनकर उभरे हैं। उपन्यास में तीन अलग-अलग ढंग के बिल्कुल अनछुए से प्रेम प्रसंग हैं। एक ओर डायना जो भले ही लंदन में पैदा हुई पर भारत आकर और चंडीदास से प्रेम करके बिल्कुल भारतीय हो गई। उसके भारतीय होने पर किसी का उस पर दबाव न था। यह प्रेम का ऐसा समर्पित स्वरुप था जो केवल राधा कृष्ण के प्रेम में ही दिखलाई देता है। वह राधा बनकर अपने चंडीदास में समा गई जिसके व्यक्तित्व में उसे हमेशा कृष्ण दिखते थे। वह कृष्ण को बंगाल के कण-कण से आत्मसात करने लगी और चंडीदास को ह्रदय में उतारती चली गई, मानो कृष्ण कह रहे हों- ''मैं हूं तुम दोनो में समाया...तमाम अधीर लिप्साओं के वशीभूत तुममें उछाहें भरता....राधा ने बांसुरी में सुर भरे और स्वयं गूंज बनकर सृष्टि के कण-कण में समा गई। चंडीदास और डायना का प्रेम कोई साधारण प्रेम न था,दिव्य प्रेम था जिसमें आसपास की घटनाएं,अंग्रेजों के भारतीयों पर होने वाले अत्याचार,सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिन्द फ़ौज,उनका पलायन,बंगाल का आकाल था और साथ-साथ चल रही थी टाम की एय्याशी की कथा,एक गढ़ा हुआ तिलिस्म जिसमें उसकी तमाम ज्यादतियों, फ़्लर्ट के साथ-साथ डायना के प्रति थोपी हुई जिन्दगी के कुछ हिस्से मन को कुरेद जाते हैं, ऐसे में डायना का चंडीदास के प्रति समर्पण संतुष्टि देता है जैसे कि एक दुराचारी के संग साथ का यही अंत होना चाहिए।

दूसरी ओर गुनगुन और सुकांत हैं जो देश को आजादी दिलाने के लिए आजाद हिन्द फ़ौज के सिपाही हैं। दोनों ने सिर पर कफ़न बांधकर प्रेम की शपथ ली है और जब दोनो एक साथ अंग्रेज सिपाही की गोली का शिकार होते हैं तो सुकांत के शरीर से निकला रक्त बह-बह कर पास ही निर्जीव पड़ी गुनगुन का माथा भिगो देता है....'लो, मेरी प्रिया, आज मैने अपने रक्त से तुम्हारी मांग भर दी आज मैंने तुम्हें वरण किया। तीसरी ओर मुनमुन और सत्यजीत हैं जो बिना किसी वैवाहिक बंधन के युवावस्था से बुढ़ापे तक साथ-साथ रहे और ऐसा डूब कर प्रेम किया जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। मुनमुन की मृत्यु सत्यजीत को तोड़ती नहीं है बल्कि वह अपनी यादों में उसे तब तक जीवित रखने का प्रण करता है जब तक वह अंतिम सांस न ले ले।

इन तीनो प्रेम प्रसंगों में जो विविधता है वह उपन्यास की कथा को गहराई तक पहुंचाती है। लेखिका ने इन प्रेम प्रसंगों की जटिलता में,बुनाव में जो बारीकी रची है अर्थात सम्बन्धों की प्रगाढ़ता ,अपने-अपने उद्देश्य और ल्क्ष्य की प्राप्ति,अप्राप्ति है वह कथा की पठनीयता को बेजोड़ सिद्व करती है। प्रकृति का मानवीकरण कथ्य की विशेषता है जिसके जरिये माहौल, भावनाएं उभर कर आती हैं। जैसे...''शाम ने परछाइयां समेट ली थीं और जादूगरनी सी परछाइयों की पिटारी लिए दबे पांव चली गई थीं।....अभी-अभी सूरज ने डुबकी लगाई है और अभी-अभी उसकी डुबकी से चकित चांद नभ से झांका है।''

डायना एक विदुषी,जागरुक और ईमानदार पात्र के रुप में उभरी है। उसका शान्तिनिकेतन जाना,रवीन्द्र्नाथ ठाकुर के भाषण,व्यक्तित्व से प्रभावित होना,जयदेव के गांव केंदुली जाना और गीत गोविंद की संरचना को कल्पनातीत महसूस करना कुछ ऐसे वाकये हैं जो लेखिका की रचना प्रक्रिया के दौरान उसके गहन अध्ययन को रेखांकित करते हैं। जगह-जगह बांग्ला गीतों का गायन चंडीदास और डायना से कराना कथा की प्रमाणिकता सिद्व करते हैं। ये गीत देश-काल और माहौल को उजागर करने में बड़े सहायक हुए हैं। डायना की मृत्यु के बाद उसके और चंडीदास के प्रेम की निशानी उनकी बेटी रागिनी कथानक को डिस्टर्ब किये बिना ऐसी जुड़ती है कि कब उपन्यास रागिनी पर केन्द्रित हो गया, पता ही नहीं चलता। हालांकि जिस परिवेश में रागिनी पली बढ़ी और जिस अपसंस्कृति का शिकार हुई उसके बाद उसका भारत आगमन, कृष्ण पर शोध और अंत में सारी समृद्वि दान कर वृंदावन में कृष्णमयी हो जाना सम्राट अशोक और राजकुमार सिद्धार्थ के इस देश में कोई अछूती घटना नहीं है। रागिनी मानसिक तनाव से जूझ रही थी। माता पिता के प्रेम को तरसती, प्रेम में मिले धोखे को लेकर उसकी भटकन और कुंठा उसे वृंदावन तक खींच लाई थी। सांस्कृतिक और सामाजिक बल्कि देशीय बदलाव भी रागिनी ने महसूस किया और भोगा भी। अपने जीवन के संक्रमण सहित अगर वह अध्यात्म की ओर अग्रसर हुई तो यह उसकी मानसिकता की पूर्णता ही है भटकाव नहीं.....''मैं हूं ही नहीं...तो वेदना कैसी ? मैं कृष्ण में समा गई हूं, अब कुछ नहीं दिखता सिवा कृष्ण के...अब तो बेलि फ़ैल गई कहा करें कोई....

बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में भारत की सामाजिक स्थिती और बदलावों का विस्तृत वर्णन इस उपन्यास में है। सिनेमा,नाटक,गायन, वादन कलकत्ता,बम्बई का अभिजात वर्ग और कला का दीवाना युवा वर्ग जो कला के साथ-साथ मौजूदा परिस्थितियों को भी नज़र की सीमा में रखता है। बंगाल के आकाल की विद्रूपता,विड्म्बना को दूर करने में नाटक के द्वारा धन संग्रह,चंदा आदि कार्यों को करने से नहीं चूकता। लेखिका की पैनी दृष्टि ने उस काल का बखूबी चित्रण अपनी लेखनी में उंडेला है।

बेहद असरदार,खूबसूरत भाषा से युक्त यह उपन्यास उन दशकों को भारतीय मंच पर बड़ी सुघड़ता से फ़ोकस करता है। घटनाएं एक बहाव में घटती चली जाती हैं और उन समीकरणों को तलाशती,उजागर करती एक विस्तृत कैनवास में ढलती चली जाती हैं।

यह पटाक्षेप है या अन्तिम दृश्य की शुरुआत इस वाक्य में जैसे सम्पूर्ण उपन्यास का कलेवर सिमट आया है। कहना न होगा कि यह उपन्यास पाठकों के बीच निश्चय ही अपनी ज़गह बनायेगा।

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टेम्स की सरगम-
मानव प्रकाशन
131 चितरंजन एवेन्यू
कोलकाता-700073-
पृष्ठ-273